Checking controversy in Goa: गोवा में चेकिंग विवाद
गोवा से एक चौंकाने वाला और विवादित मामला सामने आया है, जिसने पुलिस महकमे और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। एक नियमित वाहन चेकिंग के दौरान आईएएस अधिकारी की गाड़ी रोकना ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को भारी पड़ गया। आरोप है कि इस घटना के बाद संबंधित पुलिस अधीक्षक ने चेकिंग कर रहे पुलिसकर्मियों को अपने कार्यालय में बुलाकर उनसे जबरन उठक-बैठक करवाई। इस कार्रवाई को लेकर अब गोवा पुलिस के शीर्ष स्तर पर भी नाराजगी देखने को मिल रही है।
जानकारी के मुताबिक, ओल्ड गोवा पुलिस और इंडियन रिजर्व बटालियन (IRB) से जुड़े पुलिसकर्मी सांता क्रूज इलाके में नाकाबंदी कर वाहन जांच अभियान चला रहे थे। यह अभियान रूटीन प्रक्रिया के तहत किया जा रहा था, जिसमें संदिग्ध वाहनों की जांच और दस्तावेजों की पड़ताल की जा रही थी। इसी दौरान बिहार रजिस्ट्रेशन नंबर वाली एक कार को रोकने की कोशिश की गई, जो पणजी की ओर जा रही थी।
पुलिसकर्मियों ने कार चालक से लाइसेंस और अन्य जरूरी दस्तावेज दिखाने को कहा। इसी दौरान कार में बैठे व्यक्ति ने खुद को आईएएस अधिकारी बताया। यह कहकर वह बिना जांच कराए वहां से निकल गए। पुलिसकर्मियों के अनुसार, उस समय उन्होंने किसी तरह का विवाद नहीं किया और ड्यूटी के तहत अन्य वाहनों की जांच जारी रखी।
कुछ समय बाद वही आईएएस अधिकारी दोबारा उसी चेकिंग पॉइंट पर लौटे। बताया जा रहा है कि इस बार वह काफी गुस्से में थे। उन्होंने अपनी कार सड़क किनारे रोकी, डिक्की खोली और उसमें रखा सामान निकालकर सड़क पर फेंक दिया। इसके बाद उन्होंने पुलिसकर्मियों से कहा कि अब वे पूरी तरह से गाड़ी की जांच करें। इस घटनाक्रम के दौरान मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी असहज स्थिति में आ गए।
इतना ही नहीं, आईएएस अधिकारी ने उसी समय एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को फोन कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी और पुलिसकर्मियों के व्यवहार को लेकर शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत के बाद मामले की जांच एसपी हरिश्चंद्र मदकाइकर को सौंपी गई। जांच के नाम पर जो कार्रवाई हुई, उसने पूरे पुलिस विभाग को हैरानी में डाल दिया।
आरोप है कि एसपी हरिश्चंद्र मदकाइकर ने नाकाबंदी ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को अपने कार्यालय में तलब किया और उनसे उठक-बैठक करवाई। यह घटना सामने आने के बाद पुलिस महकमे में गहरा असंतोष फैल गया। कई पुलिसकर्मियों का कहना है कि ड्यूटी के दौरान नियमों के तहत वाहन रोकना और जांच करना उनका अधिकार और जिम्मेदारी है, ऐसे में इस तरह की सजा मनोबल तोड़ने वाली है।
घटना की जानकारी जैसे ही गोवा पुलिस के शीर्ष अधिकारियों तक पहुंची, उस पर प्रतिक्रिया भी सामने आई। गोवा के पुलिस महानिदेशक आलोक कुमार ने इस पूरे मामले में एसपी की कार्रवाई को अनुचित बताया है। डीजीपी ने स्पष्ट कहा है कि पुलिसकर्मियों से इस तरह की शारीरिक सजा कराना नियमों के अनुरूप नहीं है और यह पूरी तरह गलत है।
डीजीपी आलोक कुमार ने एसपी को निर्देश दिए हैं कि पुलिसकर्मियों को उठक-बैठक जैसी सजा देने के बजाय उन्हें ट्रैफिक नियमों के पालन और नागरिकों के साथ बेहतर व्यवहार को लेकर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नाकाबंदी पर तैनात पुलिसकर्मियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए, ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी या टकराव की स्थिति न बने।
डीजीपी ने यह भी दोहराया कि पुलिसकर्मियों को हमेशा जनता के साथ विनम्रता से पेश आना चाहिए, लेकिन साथ ही उन्हें ड्यूटी के दौरान नियमों का पालन कराने का पूरा अधिकार है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी परिस्थिति में पुलिसकर्मियों को शारीरिक दंड देना स्वीकार्य नहीं है और यह पुलिस नियमावली के खिलाफ है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पुलिस विभाग के भीतर कई सवाल उठ रहे हैं। पुलिसकर्मियों का कहना है कि अगर वे वीआईपी या वरिष्ठ अधिकारियों की गाड़ियों की जांच नहीं करेंगे, तो आम जनता के सामने कानून के समान होने का संदेश कैसे जाएगा। वहीं कुछ अधिकारी यह भी मानते हैं कि दोनों पक्षों के बीच संवाद की कमी इस विवाद की बड़ी वजह बनी।
मामले ने प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों की सीमाओं को लेकर भी बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर पुलिसकर्मी अपने साथ हुए व्यवहार को अपमानजनक बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इस घटना ने पुलिस नेतृत्व की भूमिका और अनुशासनात्मक कार्रवाई के तरीकों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
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