यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासम् अचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतम् आ सप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ - मुण्डकोपनिषद् १.२.३ वेदान्त का मूल स्वर…
हम सभी जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को छूना चाहते हैं। पर अक्सर यह सोचकर ठहर जाते हैं कि हमें…
Swami Avdheshananda Giri Ji Maharaj: हरिसेवा आश्रम के वार्षिकोत्सव पर हुआ "सन्त-सम्मेलन” श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद…