उत्तर प्रदेश

BSP on Mission 2027: मिशन 2027 पर BSP, मायावती एक महीने के भीतर करने जा रही चौथी बड़ी बैठक

BSP on Mission 2027: मिशन 2027 पर BSP

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती एक महीने के भीतर चौथी बड़ी बैठक करने जा रही हैं। 1 नवंबर को लखनऊ में होने वाली यह बैठक पिछड़ा वर्ग भाईचारा कमेटी की होगी। खास बात यह है कि आमतौर पर यह बैठक हर महीने की 11 तारीख को होती थी, लेकिन इस बार तारीख बदल दी गई है। बैठक की जानकारी सीधे मायावती के कार्यालय से दी गई है, जिससे यह साफ हो गया है कि पार्टी अब पिछड़े वर्ग पर विशेष फोकस करने जा रही है।

BSP की यह सक्रियता ऐसे समय में देखी जा रही है, जब प्रदेश की राजनीति 2027 विधानसभा चुनाव की दिशा में बढ़ रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, मायावती अब दलितों के साथ-साथ ओबीसी समाज को भी एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही हैं। मायावती ने मुस्लिम भाईचारा कमेटियों के गठन की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह कदम सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले की काट के रूप में देखा जा रहा है।

बसपा की इस बैठक में पिछड़ा वर्ग भाईचारा कमेटी के मंडल प्रभारी और जिले के प्रभारी शामिल होंगे। पिछले दिनों 9 अक्टूबर को लखनऊ में आयोजित बड़ी सभा में दलितों के साथ बड़ी संख्या में ओबीसी समुदाय के लोग भी शामिल हुए थे। उस कार्यक्रम को मायावती ने अपनी राजनीतिक रणनीति के लिहाज से सफल माना था। अब 1 नवंबर की बैठक के जरिए मायावती इन वर्गों को धन्यवाद देने और उन्हें बसपा के साथ मजबूती से जोड़ने का संदेश देने जा रही हैं।

मायावती पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश देने वाली हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर ओबीसी समाज के बीच पहुंचें, आभार व्यक्त करें और बसपा की नीतियों–रीतियों को घर-घर तक पहुंचाएं। प्रदेश में ओबीसी की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। इनमें करीब 8 प्रतिशत यादव हैं, जो सपा के कोर वोटर माने जाते हैं। वहीं कुर्मी, निषाद और राजभर जैसी जातियों का झुकाव क्षेत्रीय दलों की ओर रहा है। शेष करीब 30 प्रतिशत ओबीसी आबादी बिखरी हुई है। यही वह वर्ग है, जिस पर अब मायावती की निगाहें टिकी हैं।

बसपा ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए अति पिछड़े पाल समाज से आने वाले विश्वनाथ पाल को दूसरी बार प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। पार्टी मानती है कि ओबीसी समाज के बीच उनका प्रभाव मजबूत है और इससे संगठन को मजबूती मिलेगी।

इसी के समानांतर बसपा ने प्रदेश में मुस्लिम भाईचारा कमेटियों का गठन भी शुरू कर दिया है। अयोध्या मंडल में मोहम्मद असद को मुस्लिम भाईचारा कमेटी का संयोजक बनाया गया है, जबकि राजधानी लखनऊ में सरवर मलिक को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी की योजना है कि पहले मंडल स्तर पर इन कमेटियों का गठन किया जाए, फिर जिले और उसके बाद विधानसभा स्तर पर इन्हें विस्तारित किया जाए।

मायावती अपनी पिछली बैठक में ही यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि जनवरी 2026 से पहले पूरे प्रदेश में विभिन्न समाजों की भाईचारा कमेटियों का गठन पूरा कर लिया जाएगा। यह संगठनात्मक ढांचा बसपा की नई सोशल इंजीनियरिंग का आधार बनने जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती की इस सक्रियता ने सपा में हलचल पैदा कर दी है। खासतौर पर 9 अक्टूबर के बसपा कार्यक्रम के बाद सपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं इस बात का संकेत देती हैं कि सपा को बसपा की रणनीति से नुकसान की आशंका है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ से बड़ा लाभ मिला था। अब बसपा उसी समीकरण को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रही है।

पिछले एक महीने में मायावती ने चार बड़े आयोजन किए हैं। 9 अक्टूबर को दलित समाज को साधने की कवायद रही, जबकि 16 और 19 अक्टूबर को लखनऊ में यूपी–उत्तराखंड तथा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में मायावती ने संगठन को सक्रिय करने और सभी वर्गों को जोड़ने का संदेश दिया। अब 1 नवंबर की पिछड़ा वर्ग भाईचारा कमेटी की बैठक और मुस्लिम भाईचारा कमेटी के गठन के जरिये मायावती सपा के PDA के “P” यानी पिछड़ा और “A” यानी अल्पसंख्यक वर्ग पर सीधा निशाना साध रही हैं।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, बसपा का यह सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूला दलित, ओबीसी और मुस्लिम समाज को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश है। मायावती चाहती हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा की सामाजिक आधारभूमि फिर से मजबूत हो और उसे 2007 जैसी सफलता दोहराने का अवसर मिले।

बसपा का यह नया संगठनात्मक अभियान यह दिखाता है कि पार्टी अब सिर्फ दलित राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि व्यापक सामाजिक गठजोड़ के जरिये सत्ता में वापसी की राह तलाश रही है। मायावती के इस नए समीकरण से प्रदेश की सियासत में नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं और सपा के साथ-साथ अन्य विपक्षी दल भी इसकी बारीकी से निगरानी कर रहे हैं।

Kirti Bhardwaj

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