स्वामी अवधेशानंद जी गिरि जी

ब्रह्म ही जगत का आधार है, आत्मा ही ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है

श्रीसद्गुरु आशीषवचनम्

— “प्रभुश्री की लेखनी से” —

09 जुलाई, 2025 (बुधवार)

 

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं

मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।

तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो

विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥

– मुण्डकोपनिषद् २.२.५

 

मुण्डकोपनिषद् के द्वितीय मुण्डक के इस पंचम मंत्र में परमात्मा, आत्मा और जगत् के सम्बन्ध का जो उद्घाटन होता है, वह केवल दार्शनिक या तात्त्विक दृष्टि से ही नहीं, अपितु अनुभव के धरातल पर भी अद्वैत वेदान्त की परम परिणति को प्रकट करता है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि जो कुछ दृश्य और अदृश्य है — सब उसी एक ब्रह्म में ओत-प्रोत है। वह आत्मा ही जानने योग्य है, और अन्य सभी भाषिक अथवा वैचारिक विमर्श केवल उपाधियाँ हैं, जिन्हें छोड़कर ज्ञानयोगी को अमृत के सेतु तक पहुँचना चाहिए।

 

“यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः ।”

जिस एक ब्रह्म में द्युलोक (स्वर्ग), पृथ्वी, आकाश समस्त भौतिक ब्रह्माण्ड तथा मन और समस्त प्राण एकत्रत: पिरोए हुए हैं –

 

“तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथ ।”

उसी एक आत्मा को जानो, उसी को लक्ष्य बनाओ, और अन्य सभी वाचिक विकल्पों को त्याग दो –

“अमृतस्यैष सेतुः “ क्योंकि वही आत्मा अमृत (मोक्ष) तक पहुँचने का सेतु है।

 

भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य इस मंत्र पर भाष्य करते हुए स्पष्ट करते हैं कि —

 

“यस्मिन् ब्रह्मणि द्यौः पृथिवी च अन्तरिक्षं च ओतं प्रोतं — यह ब्रह्म न केवल इन भौतिक तत्त्वों का कारण है, बल्कि इन सबमें व्याप्त, अन्तःस्थित और नियंता भी है। समस्त सूक्ष्म और स्थूल वस्तुएँ — मन, प्राण, वाणी, इन्द्रियाँ — उसी में प्रतिष्ठित हैं।”

 

भगवद्पाद आचार्य शंकर यह भी स्पष्ट करते हैं कि “अन्या वाचः विमुञ्चथ” का तात्पर्य केवल बौद्धिक चर्चाओं या शब्द-जाल से निवृत्ति ही नहीं, वरन् सब बाह्य और परोक्ष उपाधियों का त्याग है, जिनसे आत्मा की अनुभूति बाधित होती है।

 

यह मंत्र उपनिषदों के उस मूल सूत्र का साकार रूप है – “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”।

जिस ब्रह्म में सब कुछ पिरोया गया है, वही आत्मा के रूप में अंतःस्थित है। संसार का जो भी अनुभव है – रूप, रंग, गति, संवेदना – वह उसी आत्मा का प्रतिबिम्ब है। अद्वैत का तात्पर्य है: द्वैत का समापन — ज्ञाता और ज्ञेय, द्रष्टा और दृश्य, उपासक और उपास्य- सबका लय एक में।

 

यह “जानना” भी सामान्य ज्ञान नहीं है, अपितु आत्मस्वरूप में एकत्व का अनुभूतिबोध है। अन्य समस्त भाषाएँ, सम्प्रदाय, मत, तर्क, उपासनाएँ, यहाँ तक कि विचार भी – इस अनुभूति के सामने उपाधियाँ हैं। उन्हें छोड़ देना ही “अन्या वाचो विमुञ्चथ” का आह्वान है।

 

‘अमृत’ अर्थात् मोक्ष, अविनाशी स्थिति। उस तक पहुँचने का एकमात्र सेतु — आत्मबोध है। यह आत्मा ही ब्रह्म है, और उसी की अनुभूति अमरत्व है। जैसे सेतु बिना गङ्गा को पार नहीं किया जा सकता, वैसे ही आत्मा को जाने बिना ब्रह्म की अनुभूति नहीं हो सकती।

 

यह मंत्र समस्त उपनिषदों के मर्म को एकत्र करता है – जगत में जो कुछ है, वह आत्मा में है; और आत्मा, स्वयं ब्रह्म है। अन्य सभी प्रयास, संप्रदाय, संकल्पनाएँ यदि आत्मानुभूति से वंचित हैं तो वे केवल वाणी के खेल हैं। इसलिए “तमेव जानथ आत्मानम्” उसे जानो, वही सत्य है।

“अन्या वाचो विमुञ्चथ” अन्य सब छोड़ो।

“अमृतस्यैष सेतुः” यही अमृत तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग है।

 

  • ब्रह्म ही जगत का आधार है, आत्मा ही ब्रह्म का प्रतिबिम्ब है, और आत्मबोध ही अमरत्व का सेतु है। यह मंत्र केवल उपदेश ही नहीं, मुक्ति की सीढ़ी है।

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