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समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी ?

समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए 2027 की तैयारी में अभी से जुट गए हैं। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) वोटों के सहारे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कड़ी चुनौती दी थी। अब वह इस समीकरण का और विस्तार करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने जातिगत समूहों के महापुरुषों की मूर्तियों और स्मारकों की स्थापना की घोषणा कर सामाजिक-सियासी संदेश देना शुरू कर दिया है।

ठाकुर वोटों को साधने की कवायद
9 मई को महाराणा प्रताप जयंती के मौके पर सपा कार्यालय में क्षत्रिय नेताओं की भारी भीड़ देखी गई। अखिलेश यादव पगड़ी पहनकर समारोह में शामिल हुए और महाराणा प्रताप को अपना प्रेरणास्रोत बताया। उन्होंने एलान किया कि लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट पर महाराणा प्रताप की प्रतिमा लगाई जाएगी, जिसमें उनके हाथ में सोने की तलवार भी होगी। इसके जरिए अखिलेश ने ठाकुर यानी क्षत्रिय समुदाय को अपने पाले में लाने का स्पष्ट संकेत दिया है। साथ ही, उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप की जयंती पर घोषित अवकाश को एक से बढ़ाकर दो दिन किया जाना चाहिए।

राजभर समाज को लुभाने का प्रयास
महाराणा प्रताप की जयंती से पहले अखिलेश ने राजभर समाज के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक की और सुहेलदेव महाराज की प्रतिमा लखनऊ में लगाने की घोषणा की। सुहेलदेव राजभर समुदाय के महापुरुष माने जाते हैं। अखिलेश ने कहा कि उनकी मूर्ति में अष्टधातु से बनी सोने की तलवार भी होगी। यह कदम ओपी राजभर के बीजेपी से जुड़ने के बाद सपा द्वारा उसके वोटबैंक को अपने पक्ष में बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

चौरसिया समुदाय को भी साधने की कोशिश
अखिलेश यादव ने ओबीसी के चौरसिया समाज को भी अपने पीडीए समीकरण में जोड़ने की पहल की है। 13 मार्च को पूर्व सांसद शिवदयाल चौरसिया की जयंती के मौके पर अखिलेश ने गोमती नदी किनारे उनके नाम का स्मारक बनाने का ऐलान किया। शिवदयाल को चौरसिया समाज का बड़ा नेता माना जाता है, जिनका जुड़ाव भीमराव अंबेडकर और कांशीराम जैसे नेताओं से रहा है। इस समाज का वोट शेयर भले ही 2-3% ही हो, लेकिन इनका गठजोड़ चुनावी नतीजों पर खासा असर डाल सकता है।

नोनिया, प्रजापति, लोहार जैसे समुदायों पर नजर
सिर्फ बड़े समुदायों पर ही नहीं, अखिलेश की नजर अब उन छोटी-छोटी जातियों पर भी है जो पूर्वांचल और मध्य यूपी में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। नोनिया, जो अब अपने नाम के साथ “चौहान” जोड़ने लगे हैं, के साथ ही प्रजापति, लोहार, बढ़ई जैसे ओबीसी समुदायों को सपा अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। ये सभी समुदाय पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ रहे हैं, लेकिन अब सपा उन्हें सम्मान और भागीदारी देकर अपनी ओर खींचना चाहती है।

बीजेपी की रणनीति की तर्ज पर सपा की तैयारी
2014 में अमित शाह की रणनीति के तहत बीजेपी ने यूपी में सभी छोटे जातीय समूहों को उनके महापुरुषों के जरिए सम्मान देकर और त्योहारों में भाग लेकर अपने पक्ष में किया था। अब सपा भी उसी लाइन पर चल रही है। लोक कलाकारों और क्षेत्रीय गायकों को अपने पक्ष में कर सपा आने वाले चुनावों में सांस्कृतिक-सामाजिक प्रभाव बढ़ाने की भी रणनीति बना रही है।

2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सपा ने सोशल इंजीनियरिंग को अपना सबसे अहम हथियार बना लिया है। अखिलेश यादव जातीय संतुलन और पहचान की राजनीति के जरिए यूपी की सत्ता में वापसी की राह तलाश रहे हैं। ठाकुर से लेकर अति पिछड़ी जातियों तक, सभी को सम्मान और प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अब सपा के सियासी मिशन का केंद्र बन चुकी है।

 

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