A long-standing friendship has broken: BMC चुनाव में टूटी लंबे समय से चली आ रही दोस्ती
देश की राजनीति में गठबंधन अब स्थायी व्यवस्था बन चुकी है, लेकिन महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों ने यह दिखा दिया है कि स्थानीय सियासत में समीकरण कितने तेजी से बदलते हैं। लंबे समय से साथ चल रहे राजनीतिक साथी इस बार अलग-अलग राह पर हैं, जबकि वर्षों पुरानी दूरियां भी कुछ जगहों पर कम होती नजर आ रही हैं। सबसे ज्यादा चर्चा में है देश का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध नगर निकाय, बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी बीएमसी का चुनाव, जहां राज्य की सत्ता और विपक्ष – दोनों खेमों में बिखराव साफ दिखाई दे रहा है।
महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव 15 जनवरी को कराए जाएंगे और मतगणना अगले दिन होगी। नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इन चुनावों में बीएमसी सबसे अहम मानी जा रही है, जिसका सालाना बजट 74 हजार करोड़ रुपये से अधिक है। इसी वजह से सभी राजनीतिक दलों की नजर मुंबई पर टिकी है।
बीएमसी चुनाव के बीच ठाकरे परिवार की नजदीकियां एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने मंगलवार शाम शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से उनके आवास ‘मातोश्री’ में मुलाकात की। यह मुलाकात नामांकन की अंतिम तिथि खत्म होने के बाद हुई। मुंबई और कुछ अन्य शहरों में शिवसेना (उद्धव) और एमएनएस गठबंधन में चुनाव लड़ रहे हैं।
मुंबई में इस गठबंधन में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) भी शामिल है। हालांकि सीटों के बंटवारे को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। सूत्रों के मुताबिक 227 सीटों वाली बीएमसी में शिवसेना (उद्धव) 150 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ सकती है, शरद पवार की एनसीपी को करीब 11 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि बाकी सीटें एमएनएस के हिस्से में जा सकती हैं।
दूसरी ओर, राज्य में सत्ता चला रहे महायुति गठबंधन में भी एकजुटता की कमी दिखाई दे रही है। बीजेपी और शिवसेना (एकनाथ शिंदे) मुंबई में तो साथ चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन कई अन्य नगर निगमों में दोनों दल अलग-अलग मैदान में हैं। मुंबई में बीजेपी 137 सीटों पर और शिवसेना (शिंदे गुट) 90 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसके अलावा दोनों दल अपने-अपने सहयोगी दलों को भी सीटें देने की योजना बना रहे हैं। बीजेपी और शिवसेना ने ठाणे, जलगांव और नागपुर जैसे कुछ प्रमुख नगर निगमों के लिए समझौता किया है, लेकिन पुणे, नासिक, छत्रपति संभाजीनगर, नवी मुंबई, पिंपरी-चिंचवड़, मीरा-भयंदर, सोलापुर और कई अन्य शहरों में दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं।
विपक्षी महाविकास अघाड़ी में भी तस्वीर बंटी हुई नजर आती है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना, राज ठाकरे की एमएनएस और शरद पवार की एनसीपी मुंबई में साथ हैं, लेकिन कांग्रेस ने बीएमसी में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कांग्रेस ने वंचित बहुजन अघाड़ी के साथ गठबंधन किया है, लेकिन यह गठबंधन भी मुश्किलों में घिरता दिख रहा है। प्रकाश आंबेडकर की अगुवाई वाली वीबीए को कांग्रेस ने 62 सीटें दी थीं, लेकिन पार्टी 20 सीटों पर उम्मीदवार ही नहीं उतार पाई और उसे ये सीटें कांग्रेस को लौटानी पड़ीं। वीबीए का मुख्य आधार नवबौद्ध मतदाता माने जाते हैं, लेकिन इस बार संगठनात्मक कमजोरी खुलकर सामने आई है।
बीएमसी के अलावा नागपुर नगर निगम में भी कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। एनसीपी ने कांग्रेस पर सीटें न देने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि उसने पहले 25 सीटों की मांग की थी और बाद में 15 पर भी सहमति जता दी, लेकिन कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया। 2017 के नागपुर चुनाव में बीजेपी ने भारी जीत दर्ज की थी, जहां 151 में से 108 सीटें उसके खाते में गई थीं।
नगर निगम चुनावों में कांग्रेस का रुख इस बार खासा आक्रामक है। महाविकास अघाड़ी से दूरी बनाने के बाद कांग्रेस अकेले दम पर मैदान में उतरी है। मुंबई, ठाणे, पुणे, छत्रपति संभाजीनगर और पिंपरी-चिंचवड़ समेत कई नगर निगमों में कांग्रेस कुल 528 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। साल 1999 के बाद यह पहला मौका है जब कांग्रेस इतनी बड़ी संख्या में नगर निगम सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है। नागपुर, अकोला, अमरावती और चंद्रपुर में भी कांग्रेस बिना किसी बड़े सहयोगी के चुनावी मैदान में है। लातूर और नांदेड़ में उसने अधिकांश सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि कुछ सीटें वीबीए को दी गई हैं।
बीजेपी की ओर से भी टिकट वितरण को लेकर चर्चाएं तेज हैं। पार्टी ने पहले यह ऐलान किया था कि वह मौजूदा विधायकों और सांसदों के रिश्तेदारों को टिकट नहीं देगी, लेकिन बीएमसी चुनाव में इस रुख से हटते हुए विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के परिवार के तीन सदस्यों को उम्मीदवार बनाया गया है। उनके भाई मकरंद नार्वेकर, भाभी हर्षिता नार्वेकर और चचेरी बहन गौरवी शिवलकर-नार्वेकर को टिकट दिया गया है।
नगर निगम चुनावों ने यह साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति में गठबंधन केवल सत्ता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्थानीय समीकरण, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और संगठन की ताकत हर चुनाव में नए समीकरण गढ़ रही हैं। मुंबई से लेकर नागपुर और पुणे तक, हर शहर में अलग-अलग राजनीतिक तस्वीर उभरती दिखाई दे रही है।
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