उत्तर प्रदेश

समाजवादी पार्टी को खाली करने पड़ेगी कोठी नंबर-4, जिला प्रशासन ने समाजवादी पार्टी को भेजा नोटिस, नामांतरण में हुई चूक, प्रशासन ने उठाया सख्त कदम, कोठी खाली करने के नोटिस पर शुरू हुई राजनीति

समाजवादी पार्टी को खाली करने पड़ेगी कोठी नंबर-4

पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद समाजवादी पार्टी के जिम्मेदारों ने कोठी नंबर-04 के नामांतरण को लेकर जो लापरवाही बरती, उसका परिणाम अब पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। शहर के पॉश इलाके, चक्कर की मिलक में स्थित इस कोठी को खाली करने का नोटिस जिला प्रशासन ने जारी किया है…और अब ये नोटिस राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

समाजवादी पार्टी ये कोठी वर्षों से जिला कार्यालय के रूप में इस्तेमाल कर रही थी। पहले ये भवन बिजली विभाग के अधिकारियों के उपयोग में था, जिसे बाद में सपा को किराए पर आवंटित किया गया। जब पार्टी को ये भवन मिला, तब इसकी हालत बेहद जर्जर थी। उस वक्त की जिला पंचायत अध्यक्ष रहीं कुसुमलता यादव ने अपने स्तर पर लाखों रुपये खर्च करके भवन की चार दीवारी, मंच, शौचालय और छत की मरम्मत कराई थी।

हालांकि, इन निर्माण कार्यों के लिए किसी तरह की प्रशासनिक या तकनीकी स्वीकृति नहीं ली गई थी। ये कार्य पूरी तरह व्यक्तिगत स्तर पर किया गया, जिससे भवन पर कानूनी स्थिति और भी जटिल हो गई।

वहीं, बीते साल 2024 में सपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष स्वर्गीय डीपी यादव ने एक साल का किराया जमा किया था। उसके बाद से अब तक कोई भी किराया जमा नहीं किया गया है। वर्तमान में भवन का मासिक किराया 900 रुपये है, लेकिन लगातार किराया न देने से ये राशि बकाया होती चली गई। किराया जमा न करना, भवन पर स्वामित्व के स्पष्ट अभिलेख न होना और नामांतरण प्रक्रिया पूरी न करना, ये तीनों कारण प्रशासन की सख्ती का आधार बन गए हैं।

नामांतरण की प्रक्रिया सरकारी भवनों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होती है। अगर किसी राजनीतिक दल, संस्था या व्यक्ति को भवन किराए पर दिया जाता है, तो उसके उपयोगकर्ता का नाम रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए। साथ ही, जब किसी संगठन में नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो नए पदाधिकारी को विभाग के समक्ष आवेदन देकर नामांतरण कराना होता है।

नामांतरण के लिए आवश्यक दस्तावेजों में किराया रसीद, पूर्व स्वीकृति पत्र, संगठन का पंजीकरण प्रमाणपत्र, और भवन उपयोग संबंधी विवरण शामिल होते हैं। सपा ने समय रहते ये प्रक्रिया पूरी नहीं की, जिससे प्रशासन के सामने भवन का उपयोगकर्ता स्पष्ट नहीं हो पाया।

नगर आयुक्त ने 27 मार्च 2025 को शासन को एक पत्र भेजकर कोठी नंबर-04 को राजनीतिक दल को न देकर शासकीय प्रयोजन में लेने की सिफारिश की थी। उन्होंने यह भी लिखा कि 1994 का पुराना आवंटन आदेश अब अप्रासंगिक हो चुका है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

शासन स्तर से समय पर उत्तर न मिलने पर मंडलायुक्त ने 28 मार्च को एक और पत्र भेजा और दिशा-निर्देश मांगे। जब फिर भी कोई जवाब नहीं आया, तो 23 जुलाई को उन्होंने पुनः रिमाइंडर भेजा। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रमुख सचिव नगर विकास ने स्वयं इसमें हस्तक्षेप किया और कार्रवाई शुरू कर दी।

जहां प्रशासन इस मामले को वैधानिक प्रक्रिया के तहत देख रहा है, वहीं कई राजनीतिक विश्लेषक इसे विपक्ष पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। सपा समर्थकों का मानना है कि ये एकतरफा कार्रवाई है और इसको लेकर चुनावी साल में पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि, प्रशासनिक दस्तावेज और कार्रवाई प्रक्रिया इस बात की ओर संकेत करते हैं कि, ये निर्णय तकनीकी आधार पर लिया गया है। कोठी का आवंटन अब पुराने आदेशों पर टिका है, जबकि उसका उपयोग बिना वैधानिक नामांतरण और किराया अदायगी के किया जा रहा है।

इस पूरे मामले से ये स्पष्ट होता है कि, सरकारी भवनों के उपयोग में पारदर्शिता, समय पर किराया भुगतान और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन अत्यंत आवश्यक है। सपा की यह चूक नामांतरण न कराना, किराया न देना और अवैध निर्माण ने पार्टी को एक बड़े संकट में डाल दिया है।

अगर समाजवादी पार्टी समय रहते इन सभी प्रक्रियाओं को पूरा कर लेती, तो आज कोठी खाली करने जैसी स्थिति उत्पन्न न होती।

अब देखना ये है कि, सपा इस नोटिस का क्या जवाब देती है और क्या वो कानूनी रास्ते से राहत पाने की कोशिश करेगी, या फिर प्रशासन के निर्देश का पालन करते हुए भवन खाली कर देगी। आने वाले दिनों में इस पर पार्टी की प्रतिक्रिया और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।

Kirti Bhardwaj

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