भरतपुर, धौलपुर और डीग के जाट ही क्यों मांग रहे हैं केंद्रीय OBC आरक्षण? जानिए 27 साल पुरानी पूरी कहानी

राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर और डीग जिलों में एक बार फिर जाट आरक्षण का मुद्दा गरमा गया है। हजारों लोग सड़कों पर उतरकर केंद्र सरकार से मांग कर रहे हैं कि इन जिलों के जाटों को केंद्रीय ओबीसी (OBC) सूची में शामिल किया जाए। सवाल यह है कि जब राजस्थान के बाकी जिलों के जाटों को यह सुविधा पहले से मिल रही है, तो सिर्फ इन तीन जिलों के जाट ही आंदोलन क्यों कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब करीब 27 साल पुराने एक फैसले में छिपा हुआ है।

1999 में शुरू हुई विवाद की कहानी

साल 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने राजस्थान के जाट समुदाय को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने का फैसला किया था। लेकिन इस फैसले में भरतपुर और धौलपुर के जाटों को बाहर रखा गया। सरकार का तर्क था कि इन क्षेत्रों में लंबे समय तक जाट शासकों का प्रभाव रहा है, इसलिए यहां के जाटों को सामाजिक रूप से उतना पिछड़ा नहीं माना गया जितना राज्य के अन्य हिस्सों में रहने वाले जाट समुदाय को माना गया। यहीं से आरक्षण विवाद की शुरुआत हुई।

राज्य सरकार ने दिया OBC आरक्षण

इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री Ashok Gehlot की सरकार ने जाट समुदाय को राज्य स्तर पर ओबीसी श्रेणी में शामिल किया। शुरुआत में भरतपुर और धौलपुर के जाट इसमें शामिल नहीं थे, लेकिन जनवरी 2000 में जारी एक नई अधिसूचना के जरिए उन्हें भी राज्य ओबीसी सूची में जोड़ दिया गया।

2014 में मिली राहत, 2015 में लगा झटका

साल 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री Manmohan Singh की सरकार ने नौ राज्यों के जाट समुदाय को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने की मंजूरी दी। इसमें भरतपुर और धौलपुर के जाट भी शामिल थे। जाट समाज ने इसे बड़ी जीत माना, लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी।

मार्च 2015 में Supreme Court of India ने इस फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी समुदाय को पिछड़ा घोषित करने के लिए ठोस सामाजिक और शैक्षणिक आंकड़े जरूरी हैं, केवल राजनीतिक या ऐतिहासिक आधार पर्याप्त नहीं हैं। इसके बाद भरतपुर और धौलपुर के जाट फिर से केंद्रीय ओबीसी सूची से बाहर हो गए।

राजस्थान सरकार ने फिर शुरू की प्रक्रिया

विवाद के बाद 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री Vasundhara Raje की सरकार ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग से नया अध्ययन करवाया। आयोग ने विस्तृत सर्वेक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा कि भरतपुर और धौलपुर के जाट सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर अगस्त 2017 में राजस्थान सरकार ने दोनों जिलों के जाटों को फिर से राज्य ओबीसी सूची में शामिल कर लिया। बाद में डीग जिला बनने के बाद वहां के जाट भी इसी व्यवस्था के दायरे में आ गए।

आज क्या स्थिति है?

वर्तमान में भरतपुर, धौलपुर और डीग के जाटों को राजस्थान सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का लाभ मिल रहा है। लेकिन समस्या केंद्रीय ओबीसी सूची को लेकर है। इन जिलों के जाटों को केंद्र सरकार की नौकरियों, केंद्रीय विश्वविद्यालयों, केंद्रीय शिक्षण संस्थानों और अन्य केंद्रीय सेवाओं में ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। जबकि राजस्थान के बाकी जिलों के जाटों को यह सुविधा उपलब्ध है।

2020 में फिर उठी मांग

दिसंबर 2020 में राजस्थान सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को पत्र लिखकर भरतपुर, धौलपुर और डीग के जाटों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने की सिफारिश की थी।
सरकार का तर्क था कि जब पूरे राजस्थान के जाट केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल हैं, तो केवल तीन जिलों को बाहर रखना भौगोलिक असमानता पैदा करता है। हालांकि यह मामला अभी भी लंबित है और अंतिम फैसला नहीं हो पाया है।

आखिर आंदोलन क्यों जारी है?

जाट समाज का कहना है कि जब राजस्थान के अन्य जिलों के जाटों को केंद्र स्तर पर आरक्षण का लाभ मिल रहा है, तो भरतपुर, धौलपुर और डीग के जाटों को भी वही अधिकार मिलने चाहिए। यही वजह है कि समय-समय पर इन जिलों में आंदोलन होते हैं और केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल किए जाने की मांग फिर से जोर पकड़ लेती है।

केंद्रीय ओबीसी सूची में किसी समुदाय को शामिल करने के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश, सामाजिक-शैक्षणिक आंकड़ों की समीक्षा और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसलिए यह केवल राजनीतिक घोषणा का विषय नहीं है। अब निगाहें केंद्र सरकार और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग पर टिकी हैं कि इस लंबे समय से चली आ रही मांग पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है।

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