पश्चिम बंगाल की राजनीति में 9 मई की तारीख एक नए अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रही है। विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद, अब राज्य में भगवा सरकार के गठन की तैयारी पूरी हो चुकी है। शुक्रवार शाम केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सस्पेंस खत्म करते हुए, ऐलान कर दिया कि सुवेंदु अधिकारी ही पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना महज एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि ये बंगाल के बदलते मिजाज और ‘परिवर्तन’ के असली सूत्रधार की कहानी है। जो व्यक्ति कभी ममता बनर्जी का सबसे भरोसेमंद सिपहसालार था, आज वही उनकी सत्ता को उखाड़ फेंकने वाला सबसे बड़ा योद्धा बनकर उभरा है।
सुभेंदु अधिकारी का जन्म पूर्व मेदिनीपुर के एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली ‘अधिकारी परिवार’ में हुआ। लेकिन उनका शुरुआती जीवन राजनीति से कोसों दूर था। बचपन में उनका झुकाव आध्यात्मिकता की ओर था और वे नियमित रूप से रामकृष्ण मिशन जाते थे। वे अपनी गुल्लक में जमा किए पैसे तक मिशन में दान कर देते थे। परिवार को लगने लगा था कि सुभेंदु शायद संन्यास का मार्ग चुन लेंगे।
हालांकि, उन्होंने संन्यास तो नहीं लिया, लेकिन सार्वजनिक जीवन के प्रति उनके समर्पण ने उन्हें गृहस्थ जीवन से दूर कर दिया। उन्होंने विवाह न करने का संकल्प लिया और पूरी तरह से राजनीति को अपना जीवन बना लिया। सुभेंदु की राजनीतिक यात्रा 1980 के दशक के उत्तरार्ध में कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से शुरू हुई।
उन्होंने कांग्रेस की छात्र इकाई ‘छात्र परिषद’ के जरिए राजनीति की बारीकियां सीखीं। 1995 में उन्होंने कांथी नगरपालिका का चुनाव जीता और पार्षद बने। ये उनकी पहली चुनावी सफलता थी। जब 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) बनाई, तो कुछ समय बाद शुभेंदु और उनके पिता शिशिर अधिकारी भी ममता के साथ हो लिए 2001 और 2004 के चुनावों में उन्हें हार का स्वाद भी चखना पड़ा, लेकिन सुभेंदु ने हार नहीं मानी। 2006 में दक्षिण कांथी से विधायक बनकर उन्होंने पहली बार विधानसभा की दहलीज लांघी।
सुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 2007 का नंदीग्राम आंदोलन था। वाम मोर्चा सरकार के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुए इस आंदोलन ने बंगाल की राजनीति की जड़ें हिला दी थीं। सुभेंदु इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे। उन्होंने न केवल किसानों को एकजुट किया, बल्कि वामपंथियों के गढ़ में उन्हें कड़ी चुनौती दी। इसी आंदोलन की लहर पर सवार होकर 2011 में ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने वाम शासन का अंत किया।
एक समय था जब सुभेंदु अधिकारी को ममता बनर्जी का उत्तराधिकारी माना जाता था। लेकिन 2014 के बाद पार्टी के समीकरण बदलने लगे। पार्टी में अभिषेक बनर्जी का कद बढ़ने से सुभेंदु हाशिए पर जाने लगे। उनसे युवा तृणमूल अध्यक्ष का पद छीन लिया गया और कई जिलों के पर्यवेक्षक पद से भी उन्हें मुक्त कर दिया गया।
अपमान और उपेक्षा से आहत होकर, सुभेंदु ने 19 दिसंबर 2020 को अमित शाह की मौजूदगी में बीजेपी का दामन थाम लिया। ये बंगाल चुनाव का ‘गेम चेंजर’ साबित हुआ। बीजेपी को एक ऐसा नेता मिल गया था जिसके पास जमीनी पकड़, हिंदू वोटों का आधार और संगठन चलाने की क्षमता थी।
2021 के विधानसभा चुनाव में सुभेंदु ने सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके गढ़ नंदीग्राम में चुनौती दी। यह सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं थी, बल्कि साख की जंग थी। बेहद करीबी मुकाबले में सुभेंदु ने ममता बनर्जी को हराकर देश को चौंका दिया। इसके बाद से ही उन्हें ‘जायंट किलर’ कहा जाने लगा।
2026 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत के पीछे सुभेंदु की सूक्ष्म रणनीति को ही मुख्य कारण माना जा रहा है। उन्होंने हिंदुत्व, भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण के मुद्दों पर टीएमसी को न केवल घेरा, बल्कि भवानीपुर जैसे इलाकों में भी ममता बनर्जी को हराकर ये साबित कर दिया कि बंगाल की राजनीति का नया ध्रुवतारा अब उदय हो चुका है।
सुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है। उनके सामने राज्य की कानून-व्यवस्था को सुधारने और आर्थिक मोर्चे पर बंगाल को फिर से खड़ा करने की बड़ी चुनौतियां हैं। जिस नंदीग्राम से उन्होंने विरोध की राजनीति शुरू की थी, आज उसी की जीत की इबारत ने उन्हें ‘सोनार बांग्ला’ के निर्माण की कमान सौंप दी है। 9 मई को होने वाला शपथ ग्रहण समारोह बंगाल के भविष्य की नई दिशा तय करेगा।
