‘मियां’ या ‘पाकिस्तानी’ कहना अपराध नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया केस

किसी को ‘मियां-तियां’ या फिर ‘पाकिस्तानी’ कहना अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर आपना आदेश स्पष्ट किया है। हांलाकि सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि ये गलत और आपत्तिजनक जरूर हो सकता है, लेकिन ये अपराध श्रेणी में नहीं माना जा सकता। दरअसल अदालत ने 80 साल के एक शख्स के खिलाफ दर्ज केस को खारिज करते हुए ये सब बातें कहीं। बुजुर्ग पर आरोप था कि उन्होंने एक व्यक्ति को मियां-तियां और पाकिस्तानी कहा था। इससे उसकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं और इसी मामले में उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया था। लेकिन उस केस को जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने खारिज कर दिया।

क्या था मामला ?

बेंच ने कहा बुजुर्ग पर आरोप है कि उन्होंने मियां-तियां और पाकिस्तानी कहकर धार्मिक भावनाओं को आहत किया है। निसंदेह उनकी टिप्पणी खराब है और गलत तरीके से की गई। लेकिन इससे उस व्यक्ति की धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होतीं, जिससे यह बात कही गई।  मोहम्मद शमीमुद्दीन ने आरोप लगाया था कि बुजुर्ग ने उन पर आपत्तिजनक टिप्पणी की। उन्हें मियां-तियां और पाकिस्तानी कहा। शमीमुद्दीन ने 80 साल के हरि नारायण सिंह पर यह आरोप लगाते हुए कहा था कि उनकी बातों से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।इस शिकायत के आधार पर बुजुर्ग के खिलाफ सेक्शन 298 (धार्मिक भावनाएं आहत करना), सेक्शन 504 (जानबूझकर किसी को अपमानित करना और शांति भंग), 506 (आपराधिक साजिश), 353 (सरकारी कर्मचारी से बदसलूकी) जैसी धाराओं में केस दर्ज हो गया।

मियां या ‘पाकिस्तानी’ कहना गलत, लेकिन अपराध नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय से जुड़ी टिप्पणी को लेकर अहम बात कही है। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी को ‘मियां-तियां’ या ‘पाकिस्तानी’ कहना भले सुनने में ठीक नहीं लगता हो, लेकिन ऐसे मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 298 के तहत धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसा अपराध नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट अपने एक फैसले में यह टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने इस प्रावधान के तहत एक आरोपी को दोषमुक्त करते हुए कहा कि यह टिप्पणी, हालांकि अनुचित थी, लेकिन आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए जरूरी कानूनी बाध्यता को पूरा नहीं करती।

आरोपी के खिलाफ केस खारिज

जस्टिस बी वी नागरत्ना और सतीश चंद्र शर्मा की बेंच झारखंड उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर विचार कर रही थी, जिसमें अपीलकर्ता को आरोप मुक्त करने से इनकार कर दिया गया था।

 

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