SAMBHAL POLTICIS: संभल की सियासत में शुरू हुई 'बर्क बनाम नवाब' की जंग !
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा के चुनाव अभी एक साल दूर हैं, लेकिन संभल जिले की राजनीति पहले ही मैदान में उतर चुकी है…. हाल की हिंसा से उबरते ही यहां ‘बर्क बनाम नवाब’ की पुरानी दुश्मनी ने फिर जोर पकड़ लिया है…. समाजवादी पार्टी के संभल सांसद जियाउर्रहमान बर्क के पिता मौलाना ममलूकुर्रहमान बर्क ने विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान ठोक दिया। इससे मौजूदा विधायक नवाब इकबाल महमूद के खिलाफ सीधी चुनौती खड़ी हो गई। नवाब सात बार के दिग्गज हैं और अब अपने बेटे सुहेल इकबाल को उतारने की तैयारी में हैं… ये टकराव सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए सिरदर्द बन गया है, क्योंकि दोनों परिवार पार्टी के लिए अहम हैं। संभल की मुस्लिम बहुल सीट पर वोट बैंक बंटवारे का खतरा मंडरा रहा है।
मौलाना ममलूकुर्रहमान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, वे सपा के ही हैं और संभल की जनता उनका साथ देगी। उन्होंने दावा कि, कि “टिकट मुझे ही मिलेगा, क्योंकि मैं लोगों की सच्ची आवाज हूं… उन्होंने नवाब इकबाल पर निशाना साधते हुए पूछा कि, वर्षों विधायक रहने के बावजूद संभल में क्या विकास हुआ? “जनता नाराज है, और अखिलेश यादव को ये पता है। राजनीति रिश्तों या रिश्तेदारी पर नहीं चलती… अब ऐरा-गैरा विधायक नहीं बनेंगे।.. बर्क परिवार का राजनीतिक इतिहास गौरवशाली है। उनके पिता शफीकुर्रहमान कई बार सांसद रहे। अब बेटे जियाउर्रहमान सांसद हैं, और मौलाना विधायक बनने को बेताब हैं…
दूसरी ओर, नवाब इकबाल महमूद ने भी जवाबी हमला बोला। उन्होंने बर्क के ऐलान पर कहा कि, “सबसे पहले उनसे पूछिए कि, वे सपा में हैं भी या नहीं…. पार्टी जो फैसला लेगी, वही मान्य होगा। बेटे सुहेल की दावेदारी पर उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि, “दावा तो कोई भी कर सकता है, लेकिन जीत कौन दिलाएगा? टिकट उसी को मिलना चाहिए जो जनहित लड़ सके… नवाब परिवार की पकड़ मजबूत है। सात बार लगातार जीत संभल विधानसभा पर उनका दबदबा दिखाती है। वे मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश तक के करीबी रहे।
ये दुश्मनी नब्बे के दशक से चली आ रही है। संभल की सियासत दो खेमों में बंटी हुई है… बर्क और नवाब… लोकसभा टिकट बर्क परिवार को, विधानसभा… नवाब को… शफीकुर्रहमान के जमाने से ये सिलसिला चला… उनके निधन के बाद जियाउर्रहमान ने सांसद पद संभाला… विधानसभा में नवाब अजेय रहे… दोनों ने एक-दूसरे को मात देने के हर दांव आजमाए…. नब्बे के दशक में पहली टक्कर हुई, जब बर्क ने नवाब को चुनौती दी, लेकिन हार गए…. तब से ये जंग जारी है। संभल हिंसा के बाद जियाउर्रहमान युवा मुस्लिम चेहरा बनकर उभरे, जबकि नवाब अनुभव के भरोसे हैं।
संभल सीट सपा की किलेबंदी है…. मुस्लिम वोटर बहुमत में हैं, इसलिए जीत आसान लगती है। लेकिन आंतरिक कलह वोट बंटवारा करा सकता है। योगी आदित्यनाथ सरकार के सख्त रवैये ने पहले ही सपा को परेशान किया है। अब ये फूट अखिलेश के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी में संतुलन कैसे बनेगा? क्या बेटे सुहेल को मौका देकर नवाब परिवार को मजबूत रखेंगे, या बर्क को विधायक बनाकर युवा चेहरा मजबूत करेंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि, गलत फैसला पड़ोसी सीटों पर असर डालेगा। संभल जैसे संवेदनशील इलाके में एकता जरूरी है।
अखिलेश यादव की रणनीति पर नजरें टिकी हैं। वे मुस्लिम वोट एकजुट करने पर जोर दे रहे हैं। हाल की हिंसा ने जियाउर्रहमान को सहानुभूति दिलाई। नवाब की सात जीतें वफादारी साबित करती हैं। सपा के पुराने सूत्र बताते हैं कि, अखिलेश दोनों को साधने की कोशिश करेंगे। शायद संभल लोकसभा बर्क को, विधानसभा नवाब परिवार को ही रखें। लेकिन मौलाना का ऐलान इस समीकरण को बिगाड़ सकता है। अगर बर्क बगावत करते हैं, तो निर्दलीय या अन्य दल में चले जाएंगे, जो सपा के लिए नुकसान होगा।
ये जंग सिर्फ टिकट की नहीं, सियासी विरासत की है। बर्क परिवार पिता-पुत्र की जोड़ी से मजबूत, नवाब सात बार की सफलता से। संभल के विकास सड़क, शिक्षा, रोजगार दोनों ने वादे किए, लेकिन जनता असंतुष्ट रही… हिंसा ने विकास ठप कर दिया… अब वोटर देखेंगे कौन सच्चा हितैषी है। भाजपा इस फूट का फायदा उठा सकती है। योगी का हिंदुत्व एजेंडा मुस्लिम वोट सेंक सकता है। सपा को एकजुट रहना होगा।
2027 चुनाव में यूपी की 403 सीटों पर जंग होगी, लेकिन संभल जैसी सीटें निर्णायक है…. अखिलेश अगर बैलेंस बनाते हैं, तो मजबूत संदेश जाएगा… वरना, पुरानी दुश्मनी नई हार लाएगी। फिलहाल बयानबाजी तेज है। मौलाना और नवाब के बीच तलवारें भिड़ रही हैं। अखिलेश का अगला कदम तय करेगा कि संभल सपा का गढ़ बनेगा या कलह का अखाड़ा। राजनीति में वक्त ही राजा है देखते हैं, फैसला किसका होगा।
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