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Russia-India Train: राजधानी-शताब्दी से मॉस्को पहुंचने में लगेंगे कितने दिन? सफर लंबा, फायदे अनगिनत

 नईदिल्ली 
रूस-भारत की दोस्ती के बारे में बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये सोवियत संघ के जमाने से इतनी गहरी रही है कि गाढ़े वक्त में दोनों साथ रहे हैं. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब भारत दौरे पर आए थे, तब भी दोनों देशों ने इस दोस्ती को सेलिब्रेट करते हुए कहा था कि रूस और भारत बुरे वक्त के साथी हैं. अब इस दोस्ती को और पक्की करने के लिए रूस ने भारतीय महासागर तक पहुंचने वाले रेल मार्ग की संभावना तलाशने का प्रस्ताव रखा है. रूसी उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने रूसी एजेंसी TASS को दिए इंटरव्यू में जैसे ही कहा कि वे भारत तक पहुंचने के लिए एक ट्रेन रूट पर काम करना चाहते हैं, ये पूरी दुनिया की सुर्खियों में आ गया. अब दिलचस्प सवाल ये है कि भारत की रूस से 4500 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी ट्रेन से तय होगी, तो इसमें कितना वक्त लगेगा?

रूस का कहना है कि बोस्फोरस और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए वैकल्पिक रूट पर विचार करना जरूरी है. ऐसे में रूस से तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत तक पहुंचने वाले संभावित मार्ग का उल्लेख किया गया है. रूसी उप प्रधानमंत्री के मुताबिक भारत तक पहुंच देने वाला कोई भी विकल्प स्वीकार्य है. हालांकि यह प्रस्ताव अभी चर्चा के चरण में है. इसे लेकर दोनों देशों की ओर से कोई स्पष्ट परियोजना, समय सीमा, यात्री ट्रेन सेवा, टिकट फेयर या लॉन्च की तारीख घोषित नहीं हुई है। 

हाई-स्पीड ट्रेन से मास्को पहुंचने में कितना वक्त लगेगा?
    भारत में वर्तमान में सबसे तेज चलने वाली ट्रेनें वंदे भारत जैसी सेवाएं हैं, जिनकी मैक्सिमम स्पीड कुछ रूट पर 160 किलोमीटर प्रति घंटा है. प्रस्तावित रूस-भारत रेल मार्ग की सटीक लंबाई अभी तय नहीं है, लेकिन मॉस्को से दिल्ली तक वायु मार्ग करीब 4,340 किलोमीटर है. अगर ये शताब्दी-राजधानी जैसी ट्रेनों से तय की जाए, जिनकी स्पीड 130-150 किलोमीटर प्रतिघंटा है, तो इसमें 33 घंटे का वक्त लगेगा। 

    चूंकि रेल रूट को तुर्कमेनिस्तान-ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान से गुजारा जाएगा, तो इसकी अनुमानित दूरी 6000 से 7500 किलोमीटर या उससे अधिक हो सकती है. मान लें कि कुल दूरी करीब 7000 किलोमीटर है और अगर ट्रेन लगातार 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती है. ऐसे में इसमें करीब 44 घंटे यानी लगभग दो दिन लगेंगे लेकिन 130-150 किलोमीटर प्रतिघंटा की स्पीड से इसमें 50-53 दिन लग जाएंगे। 

    थोड़ा और व्यावहारिक होकर देखें, तो सीमा पार जांच, स्टॉप, गेज परिवर्तन, ट्रैक की स्थिति और औसत गति कम होने के कारण यह समय 3 से 5 दिन या उससे अधिक हो सकता है.  भविष्य में भारत की प्रस्तावित बुलेट ट्रेन जैसी 300-320 किलोमीटर प्रति घंटे की गति वाली सेवाएं उपलब्ध हों तो समय आधा रह सकता है, लेकिन तब भी अंतरराष्ट्रीय रूट पर आने वाली समस्याएं यात्रा को और लंबा करेंगी। 

हालांकि यह अनुमान पूरी तरह काल्पनिक है क्योंकि मार्ग अभी प्रस्ताव मात्र है. यह विचार ऐतिहासिक रूप से भी दिलचस्प है. 19वीं सदी में भी रूस से भारत तक रेल जोड़ने के प्रस्ताव आए थे लेकिन आज के संदर्भ में यह रूस की रणनीतिक जरूरतों और भारत-रूस संबंधों को ये नई दिशा दे सकता है. सफलता कई देशों के सहयोग, निवेश और स्थिरता पर निर्भर करेगी. फिलहाल यह एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव है जो भविष्य की कनेक्टिविटी की संभावनाएं खोलता है, लेकिन इसे हकीकत में बदलने में काफी समय और प्रयास लगेंगे। 

रूस-भारत के बीच ट्रेन सेवा मील का पत्थर क्यों?

    भारत-रूस रेल लिंक का मुख्य उद्देश्य माल ढुलाई के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार करना है, ताकि समुद्री मार्गों पर निर्भरता घटे. होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल व्यापार का करीब 25 प्रतिशत और एलएनजी शिपमेंट का करीब 20 प्रतिशत गुजरता है.क्षेत्रीय तनावों के बीच ऐसे चोकपॉइंट्स की सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है. ऐसे में ये अहम विकल्प बन सकता है। 

    इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसी पहल पहले से रूस, ईरान और भारत के बीच मल्टी मॉडल कनेक्टिविटी को बढ़ावा दे रही है. रूस, मध्य एशिया और ईरान में रेल इंफ्रास्ट्रक्चर का कुछ हिस्सा पहले से सक्रिय है और माल परिवहन बढ़ रहा है. ऐसे में उसे इसका अनुभव है। 

    बावजूद इसके प्रस्तावित मार्ग में कई दिक्कतें भी आने वाली हैं- क्रॉस बॉर्ड स्टैंडर्ड, रेल गेज में समानता नहीं होना, जियोपॉलिटकल  कठिनाइयां और भारत तक निर्बाध कनेक्टिविटी. पाकिस्तान और अफगानिस्तान से गुजरने वाले रूट पर सुरक्षा और सहयोग संबंधी चुनौतियां आने वाली हैं. अगर यह हो जाता है तो रूस के लिए भारतीय महासागर तक सीधी भूमि पहुंच मिलेगी. भारत के लिए यह मध्य और दक्षिण एशिया के साथ ओवरलैंड कनेक्टिविटी मजबूत कर सकता है. माल ढुलाई में पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में समय बचत की उम्मीद है। 

 

Rupesh Jha

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