राजस्थान

Pia Dandiya US: जयपुर से जुड़ी जड़ें, दिल्ली की झुग्गियों में बच्चों को पढ़ाया, अब अमेरिका में सांसद बनीं पिया डांडिया

Pia Dandiya US Election 2026: राजस्थान के जयपुर से पारिवारिक रिश्ता रखने वाली भारतीय मूल की पिया डांडिया ने अमेरिका की राजनीति में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार पिया ने फ्लोरिडा की 22वीं कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट सीट से जीत दर्ज की है। वह अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी जाने वाली दूसरी भारतीय मूल की महिला बन गई हैं। खास बात यह है कि अमेरिका में जन्मीं पिया का बचपन से जयपुर से गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाया और शिक्षा के क्षेत्र में काम करते हुए अमेरिकी संसद तक का सफर तय किया।

कौन हैं पिया डांडिया, जिनकी जीत से राजस्थान में भी चर्चा?
पिया डांडिया भारतीय मूल की अमेरिकी शिक्षाविद और डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता हैं। उनका जन्म और पालन-पोषण अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य की पाम बीच काउंटी में हुआ। उनके माता-पिता राजस्थान के जयपुर से अमेरिका जाकर बसे थे।

पिया के पिता डॉ. रोहित डांडिया पेशे से चिकित्सक हैं। उनके परिवार ने 1980 के दशक में अमेरिका में अपना जीवन शुरू किया था। वहीं, उनकी मां ने फ्लोरिडा के जुपिटर शहर में एक मॉन्टेसरी स्कूल की स्थापना की।

अमेरिका में रहने के बावजूद पिया के परिवार ने उन्हें भारतीय संस्कृति और अपनी जड़ों से जोड़े रखा। यही वजह है कि पिया का राजस्थान से विशेष लगाव रहा है।

बचपन में अकेले जयपुर भेजते थे माता-पिता
पिया डांडिया के जीवन में जयपुर की अहम भूमिका रही है। उनके माता-पिता बचपन में उन्हें अमेरिका से भारत भेजते थे, ताकि वह अपने रिश्तेदारों और परिवार के बच्चों के साथ समय बिता सकें।

इन यात्राओं के दौरान पिया ने भारतीय समाज, संस्कृति और यहां की जीवनशैली को करीब से समझा। अलग-अलग देशों के सामाजिक और आर्थिक हालात को देखने का अवसर भी उन्हें मिला।

अगस्त 2025 में दिए एक इंटरव्यू में पिया ने बताया था कि भारत की इन यात्राओं ने उनके व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने समझा कि अलग-अलग लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में लोगों के जीवन और अवसरों में कितना अंतर होता है।

दिल्ली की झुग्गियों में बच्चों को पढ़ाकर समझा गरीबी का दर्द
पिया डांडिया की जिंदगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही थीं।

कॉलेज के पहले वर्ष के बाद गर्मियों की छुट्टियों में वह भारत आईं और नई दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले जरूरतमंद बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने का काम किया।

उन्होंने आशा कोऑपरेटिव सोसाइटी के माध्यम से 7 से 17 साल तक के बच्चों को शिक्षा दी। इस दौरान उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की समस्याओं को करीब से देखा।

दिल्ली में मिले इन अनुभवों ने शिक्षा और सामाजिक असमानता को लेकर उनकी सोच को प्रभावित किया। आगे चलकर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाया।

महज 28 साल की उम्र में बनीं स्कूल प्रिंसिपल
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद पिया डांडिया ने शिक्षा के क्षेत्र में काम करना शुरू किया।

वह ‘टीच फॉर अमेरिका’ कार्यक्रम से जुड़ीं और वंचित समुदायों के बच्चों को पढ़ाया। इसके बाद उन्होंने न्यूयॉर्क के हार्लेम इलाके में एक स्कूल का नेतृत्व किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महज 28 वर्ष की उम्र में वह स्कूल प्रिंसिपल बन गई थीं। उन्होंने ऐसे बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया, जिन्हें आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।

उनके नेतृत्व वाले स्कूल में बड़ी संख्या में विद्यार्थी वंचित परिवारों से आते थे। शिक्षा के क्षेत्र में किए गए काम ने उन्हें सार्वजनिक सेवा में आगे बढ़ने का अवसर दिया।

व्हाइट हाउस फेलो से लेकर Apple तक किया काम
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के बाद पिया डांडिया को प्रतिष्ठित व्हाइट हाउस फेलोशिप कार्यक्रम के लिए चुना गया।

इस कार्यक्रम के माध्यम से उन्हें अमेरिकी प्रशासन और नीति निर्माण की प्रक्रिया को समझने का अवसर मिला।

इसके बाद उन्होंने टेक्नोलॉजी कंपनी Apple में भी काम किया। यहां वह राज्य सरकारों के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी व्यवस्थाओं को आधुनिक बनाने से जुड़े कार्यों में शामिल रहीं।

शिक्षा, प्रशासन और तकनीक के क्षेत्र में मिले अनुभवों के बाद पिया ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा।

फ्लोरिडा में रिपब्लिकन उम्मीदवार को हराकर जीता चुनाव
अमेरिका के 2026 मध्यावधि चुनाव में पिया डांडिया ने डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से फ्लोरिडा की 22वीं कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट सीट पर चुनाव लड़ा।

उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी अस्कर से था।

4 नवंबर को प्रकाशित चुनावी रिपोर्टों के अनुसार, पिया को लगभग 51.9 प्रतिशत और अस्कर को 48.1 प्रतिशत वोट मिले। एसोसिएटेड प्रेस ने पिया डांडिया की जीत की पुष्टि की।

इस चुनावी क्षेत्र की सीमाओं में बदलाव भी हुआ था, जिसके कारण यह मुकाबला अमेरिकी राजनीति में चर्चा का विषय बना रहा।

अमेरिकी संसद पहुंचने वाली दूसरी भारतीय मूल की महिला
पिया डांडिया की जीत भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण है।

वह प्रमिला जयपाल के बाद अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए चुनी जाने वाली दूसरी भारतीय मूल की महिला हैं। इसके साथ ही पिया फ्लोरिडा से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पहुंचने वाली पहली दक्षिण एशियाई प्रतिनिधि भी बनी हैं।

उनकी जीत से अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं की भागीदारी एक बार फिर चर्चा में आ गई है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई रहे चुनाव के प्रमुख मुद्दे
पिया डांडिया ने अपने चुनाव अभियान में आम परिवारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी।

उन्होंने बेहतर शिक्षा, किफायती स्वास्थ्य सेवाओं, जीवनयापन की बढ़ती लागत और आर्थिक अवसरों पर जोर दिया। इसके अलावा सामाजिक सुरक्षा और बुजुर्गों से जुड़ी सरकारी योजनाओं की सुरक्षा को भी अपने एजेंडे में शामिल किया।

चुनाव जीतने के बाद अपने संबोधन में उन्होंने बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल, बेहतर भविष्य और परिवारों के लिए सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत पर जोर दिया।

जयपुर से दिल्ली और फिर अमेरिकी संसद तक का सफर
पिया डांडिया की कहानी तीन अलग-अलग स्थानों से जुड़ी हुई है। राजस्थान का जयपुर, जहां उनके परिवार की जड़ें हैं। दिल्ली, जहां उन्होंने जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाकर सामाजिक असमानता को करीब से समझा। और अमेरिका, जहां शिक्षा एवं सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में काम करने के बाद उन्होंने चुनाव जीतकर प्रतिनिधि सभा में जगह बनाई।

हालांकि पिया का जन्म और पालन-पोषण अमेरिका में हुआ, लेकिन भारत से उनके पारिवारिक और सामाजिक संबंध उनकी जीवन यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

अब फ्लोरिडा की जनता ने उन्हें अमेरिकी कांग्रेस में अपना प्रतिनिधि चुना है। उनकी जीत राजस्थान से जुड़े प्रवासी भारतीय परिवारों की उपलब्धियों की भी एक नई मिसाल बन गई है।

Deepak Arora

दीपक अरोड़ा एक मीडिया उद्यमी, डिजिटल रणनीतिकार और लेखक हैं। "दीपक की कलम से" के माध्यम से वे राजनीति, समाज, शिक्षा, मीडिया और समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार और विश्लेषण पाठकों तक पहुँचाते हैं। उनकी लेखनी का उद्देश्य जागरूकता, संवाद और सकारात्मक सामाजिक चिंतन को बढ़ावा देना है।

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