राजस्थान, जो अपनी भौगोलिक विशालता और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाओं के लिए जाना जाता है, वर्तमान में औद्योगिक विकास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। राज्य सरकार ‘राइजिंग राजस्थान इन्वेस्टमेंट समिट’ के माध्यम से निवेश के नए कीर्तिमान स्थापित करने का दावा कर रही है, लेकिन हाल ही में जारी ‘इंडिया इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट रेडीनेस इंडेक्स 2026’ ने इन दावों पर एक गंभीर चर्चा छेड़ दी है। ये रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि निवेश के प्रस्तावों और उन्हें धरातल पर उतारने की तैयारी के बीच अभी एक लंबी दूरी तय करना बाकी है।
मुंबई की फर्म सिल्वरराइज़ ग्रुप द्वारा जारी इस रिपोर्ट में 100 अंकों के पैमाने पर राज्यों की कार्यक्षमता और बुनियादी ढांचे का मूल्यांकन किया गया। राजस्थान को इस सूचकांक में मात्र 43 अंक प्राप्त हुए हैं, जो इसे राष्ट्रीय स्तर पर 10वें स्थान पर रखता है।
रिपोर्ट में राज्यों को कई श्रेणियों में विभाजित किया गया है…
Front Runner: इस श्रेणी में ओडिशा (71 अंक), गुजरात (67 अंक) और महाराष्ट्र (63 अंक) जैसे राज्य शीर्ष पर हैं।
Competitive: हरियाणा जैसे भू-आबद्ध (Landlocked) राज्यों ने 50 अंकों के साथ इस श्रेणी में जगह बनाई है।
Emerging State: राजस्थान को इसी श्रेणी में रखा गया है, जो दर्शाता है कि राज्य अभी निवेश के लिए अपनी पूरी क्षमता विकसित नहीं कर पाया है।
राज्य सरकार ने ‘राइजिंग राजस्थान’ के तहत 9 लाख करोड़ रुपए के औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को ग्राउंड करने यानी धरातल पर शुरू करने का दावा किया है। हालांकि, इंडेक्स की रिपोर्ट इन दावों की ‘कार्यान्वयन क्षमता’ यानी (Implementation Capability) पर प्रश्नचिह्न लगाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, केवल निवेश के प्रस्ताव प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है; उन परियोजनाओं को शुरू करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा और त्वरित प्रशासनिक प्रक्रियाएं राजस्थान में अभी भी विकासशील अवस्था में हैं।
सिल्वरराइज़ ग्रुप के इंडस्ट्रियल बिज़नेस हेड सुनील पगाडे ने अपने IFISP (Industrial Feasibility & Infrastructure Scalability Protocol) फ्रेमवर्क के आधार पर राजस्थान की स्थिति का विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, राजस्थान के पिछड़ने के कई कारण हैं क्योंकि राजस्थान एक विशाल राज्य है, लेकिन यहां औद्योगिक केंद्रों के बीच लॉजिस्टिक्स का जुड़ाव और परिवहन की लागत अभी भी एक बड़ी बाधा है।
औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाओं को तेजी से बढ़ाने की क्षमता अन्य विकसित राज्यों की तुलना में कम है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने औद्योगिक क्लस्टर विकसित किए हैं जहां उद्यमी को केवल अपनी मशीनें लगानी होती हैं। राजस्थान के विकासशील क्षेत्रों में अभी भी इस ‘प्लग-एंड-प्ले’ मॉडल की कमी है।
बुनियादी ढांचे और कार्यान्वयन संबंधी खामियों के कारण राजस्थान भारतीय औद्योगिक पदानुक्रम के तीसरे पायदान पर बना हुआ है। रिपोर्ट में राजस्थान की एक बड़ी ताकत का भी उल्लेख किया गया है। राज्य को ‘रिन्यूएबल मैन्युफैक्चरिंग’ (सौर और पवन ऊर्जा उपकरण निर्माण) के लिए एक प्रमुख गंतव्य के रूप में मान्यता दी गई है। सौर ऊर्जा क्षेत्र में राजस्थान की अग्रणी भूमिका भविष्य में अन्य उद्योगों के लिए भी उत्प्रेरक का कार्य कर सकती है, बशर्ते इसे बेहतर लॉजिस्टिक्स सपोर्ट मिले।
राजस्थान के लिए ये रिपोर्ट एक ‘वेक-अप कॉल’ की तरह है। हरियाणा जैसे अन्य भूमि-आबद्ध राज्यों का ‘कंपीटिटिव’ श्रेणी में होना ये सिद्ध करता है कि, समुद्र तट की अनुपलब्धता विकास में बाधक नहीं है, बल्कि बेहतर नीतियां और बुनियादी ढांचा अधिक महत्वपूर्ण हैं।
अगर राजस्थान को वास्तव में एक ‘राइजिंग’ स्टेट बनना है, तो उसे केवल निवेश प्रस्तावों के आंकड़ों तक सीमित न रहकर कॉरिडोर-स्तर के क्रियान्वयन और औद्योगिक क्लस्टर्स के आधुनिकीकरण पर ध्यान देना होगा। “उभरते निवेश गंतव्य” से “फ्रंट रनर” बनने का सफर केवल मजबूत इच्छाशक्ति और ठोस धरातलीय सुधारों से ही संभव है।
