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कानपुर के ‘किडनी कांड’ में बड़ा खुलासा !

कानपुर के रावतपुर इलाके में स्थित एक चार मंजिला अस्पताल, जो कभी मरीजों और डॉक्टरों की आवाजाही से भरा रहता था, अब पूरी तरह सुनसान पड़ा है। अस्पताल के भीतर दाखिल होते ही ऐसा लगता है जैसे समय अचानक थम गया हो। रिसेप्शन पर कुर्सियां खाली हैं, रजिस्टर खुले पड़े हैं और फाइलें बिखरी हुई हैं।

इमरजेंसी रूम में आधी इस्तेमाल दवाइयां और बेड पर पड़ी सिलवटें इस बात की गवाही दे रही हैं कि कुछ ही समय पहले यहां इलाज चल रहा था। लेकिन अब यहां सिर्फ सन्नाटा है, जो एक बड़े राज की ओर इशारा करता है। इस पूरे मामले की परतें तब खुलनी शुरू हुईं जब अस्पताल के बाहर तैनात एक सिक्योरिटी गार्ड ने बेहद सामान्य शब्दों में बड़ी जानकारी दे दी।

गार्ड के मुताबिक, पुलिस एक दिन पहले ही अस्पताल पहुंची थी और अस्पताल के संचालक डॉक्टर दंपति को अपने साथ ले गई थी। इसके बाद अस्पताल का पूरा स्टाफ अचानक गायब हो गया। किसी ने कोई जानकारी नहीं दी, और धीरे-धीरे पूरा परिसर खाली हो गया।

पुलिस ने इस मामले में अस्पताल संचालक डॉक्टर दंपति को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि इसी अस्पताल में अवैध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट किए जा रहे थे। शुरुआती जांच में सामने आया है कि बिना जरूरी अनुमति के ऑपरेशन थिएटर में किडनी ट्रांसप्लांट किए जाते थे और इसके बदले मोटी रकम वसूली जाती थी। एक ट्रांसप्लांट के लिए तीन से चार लाख रुपये तक की फीस ली जाती थी, जबकि डोनर और रिसीवर के बीच अलग से करोड़ों तक के सौदे तय होते थे।

जांच एजेंसियों के मुताबिक, यह कोई छोटा मामला नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क था, जिसमें दलाल, डॉक्टर, अस्पताल प्रबंधन और अन्य लोग शामिल थे। इस नेटवर्क का एक अहम हिस्सा एक कथित बिचौलिया था, जो जरूरतमंद और गरीब लोगों को ढूंढता था। उन्हें पैसों का लालच देकर किडनी देने के लिए तैयार किया जाता था। इसके बाद उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि उनकी किडनी किसी जरूरतमंद रिश्तेदार के लिए ली जा रही है।

वहीं, इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू उन लोगों की कहानी है, जो आर्थिक तंगी के चलते इस जाल में फंस गए। एक युवक, जो उत्तराखंड का रहने वाला बताया जा रहा है, को 10 लाख रुपये का लालच देकर किडनी देने के लिए तैयार किया गया। उसे यह बताया गया कि उसकी किडनी किसी परिचित के इलाज के लिए इस्तेमाल होगी। लेकिन बाद में आरोप लगा कि उसकी किडनी निकालकर उसे सिर्फ 6 लाख रुपये नकद और 3.5 लाख रुपये का चेक दिया गया, जबकि उसी किडनी को एक महिला के परिजनों को 90 लाख रुपये से अधिक में बेचा गया।

ऑपरेशन के बाद डोनर और रिसीवर को कुछ समय तक अस्पताल में रखा जाता था, लेकिन बाद में उन्हें अलग-अलग स्थानों पर शिफ्ट कर दिया जाता था। इसका उद्देश्य यह था कि दोनों के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित न हो सके और जांच की स्थिति में पूरा नेटवर्क एक साथ उजागर न हो। डोनर को दूसरे अस्पताल में भर्ती कर उसकी पहचान बदल दी जाती थी, जबकि रिसीवर को किसी अन्य स्थान पर ले जाया जाता था।

इस रैकेट का खुलासा तब हुआ जब एक डोनर को तय रकम नहीं मिली और उसे लगातार टाला जाने लगा। परेशान होकर उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू की। शुरुआती जांच में ही कई ऐसे संकेत मिले, जिससे स्पष्ट हो गया कि मामला बड़े स्तर पर चल रहे अवैध नेटवर्क से जुड़ा हुआ है।

क्राइम ब्रांच ने इसके बाद देर रात कई अस्पतालों में एक साथ छापेमारी की। इस कार्रवाई में कई अस्पतालों को जांच के दायरे में लिया गया। छापेमारी के दौरान संदिग्ध दस्तावेज, मरीजों का रिकॉर्ड और अन्य महत्वपूर्ण सबूत बरामद किए गए। कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है।

जांच में यह भी सामने आया है कि इस नेटवर्क का दायरा छात्रों तक फैला हुआ था। एक डोनर ने खुद को एमबीए का छात्र बताया। सूत्रों के अनुसार, एक अन्य मामले में एक छात्रा से करीब 4 लाख रुपये में किडनी डोनेट करवाई गई, जिसे बाद में 45 से 50 लाख रुपये में बेचने की आशंका जताई जा रही है।

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