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हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, बहू के नाम घर होने पर भी सास को रहेगा रहने का अधिकार

शिमला

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा के एक मामले में साफ किया कि बहू के नाम वाले घर में भी सास का रहने का अधिकार है. बहू सास को सिर्फ इसलिए बेदखल नहीं कर सकती कि मकान उसके नाम पर है और उसने ये मकान अपनी कमाई से खरीदा है. अदालत ने कहा कि साझा गृहस्थी के अधिकार के तहत ये जरूरी नहीं है कि संपत्ति पति, सास या पीड़ित महिला के नाम पर हो। 

बहू के नाम वाले घर में सास को रहने का अधिकार
जस्टिस राकेश कैथला ने सुरभि बेदी बनाम मनजीत कौर मामले में बहू की याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि बहू के नाम वाले घर में भी सास को रहने का पूरा अधिकार है. कोर्ट ने मंडी जिले की निचली अदालत और अपीलीय अदालत के उस फैसले को सही माना, जिनमें सास के संयुक्त कब्जे को बहाल करने का आदेश दिया गया था। 

तीसरे व्यक्ति को किराएदार बना सास को बेदखल करना उचित नहीं
अदालत ने कहा कि साझा गृहस्थी की परिभाषा के लिए यह आवश्यक नहीं है कि संपत्ति पति, सास या पीड़ित महिला के नाम पर हो। यदि कोई महिला घरेलू संबंध के तहत किसी मकान में रह चुकी है, तो वह मकान साझा गृहस्थी माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि जब बहू ने स्वयं स्वीकार किया है कि सास-ससुर उसके साथ उसी मकान में रह रहे थे, तो दोनों के बीच घरेलू संबंध स्थापित होता है। ऐसे में किसी तीसरे व्यक्ति को किराएदार बनाकर सास को अप्रत्यक्ष रूप से बेदखल करना कानूनन उचित नहीं है।

HC ने SC के इन 2 फैसलों का दिया हवाला
न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं के आवास संबंधी अधिकारों की रक्षा करना है. अदालत ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों सतीश चन्द्र अहूजा बनाम स्नेहा अहूजा और प्रभा त्यागी बनाम कमलेश देवी मामलों का हवाला दिया. अदालत ने कहा कि साझा गृह वह है, जहां पक्षकार किसी भी समय घरेलू संबंध में साथ रह चुके हों, चाहे उस मकान का स्वामित्व किसी एक पक्ष के नाम ही क्यों न हो. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सास, बहू, पत्नी, मां, बेटी या संयुक्त परिवार की अन्य महिला सदस्य सभी को साझा गृह में निवास का अधिकार है. अगर किसी महिला को ऐसे घर से कानूनन प्रक्रिया अपनाए बिना निकाला जाता है, तो यह उसके अधिकारों का उल्लंघन होगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि बहू किरायेदार रखकर भी सास को साझा गृह से बेदखल नहीं कर सकती और संयुक्त कब्जा बहाल करने का निचली अदालत का आदेश पूरी तरह सही है। 

बहू सास को घर से बाहर नहींं निकाल सकती
अदालत ने साफ किया कि सिर्फ मालिकाना हक किसी एक के नाम पर होने से साझा गृहस्थी का अधिकार खत्म नहीं होता. इसीलिए सास को घर से नहीं निकाला जा सकता. बता दें कि मंडील जिले के रामनगर की महिला ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा था कि उसके बेटे की शादी साल 2013 में हुई थी. पूरा परिवार एक ही घर में रहता था. साल 2025 में परिवार में विवाद हुआ तो बहू ने कहा कि ये घर उसने अपनी निजी कमाई से बनवाया है. मकान पर सिर्फ उसका अधिकार है. उसने किरायेदार रखकर सास को घर से बाहर निकाल दिया। 

घरेलू संबंध के तहत सास को बेदखल करना गैरकानूनी
सास ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कोर्ट का दवराजा खटखटाते हुए सुरक्षा, संरक्षण और निवास के अधिकार की मांग की. वहीं बहू ने कहा कि उसने ये मकान अपनी कमाई से खरीदा है. उसकी मालिक सिर्फ वही है. बहू ने अदालत को ये भी बताया कि पहले सास-ससुर उसके साथ ही रहते थे. इस पर कोर्ट ने कहा कि सास पहले बहू के साथ रहती थी ऐसे में उनके बीच घरेलू संबंध स्थापित होता है.  ऐसे में बहू का किसी तीसरे को किरायेदार बनाकर सास को घर से अप्रत्यक्ष रूप से बेदखल करना कानूनन सही नहीं है। 

Rupesh Jha

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