Major change in the strategy of SP: सपा की रणनीति में आता दिख रहा बड़ा बदलाव
लखनऊ में 9 अक्टूबर को बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कांशीराम परिनिर्वाण दिवस पर एक विशाल रैली कर राजनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। लाखों की भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया कि बसपा को समाप्त मानने वाले राजनीतिक विश्लेषकों और विरोधी दलों को अब अपनी धारणा पर पुनर्विचार करना होगा। इस रैली के केंद्र में मायावती के साथ उनके भतीजे और बसपा के राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद रहे।
मायावती ने इस रैली में जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठजोड़ पर तीखा हमला बोला, वहीं भाजपा पर अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया। उन्होंने यह साफ संकेत दिया कि बसपा आने वाले चुनावों में अब नए जोश और रणनीति के साथ मैदान में उतरने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा कि जैसे कांशीराम ने उन्हें आगे बढ़ाया था, वैसे ही वे अब आकाश आनंद को पार्टी का भविष्य बना रही हैं।
बसपा की इस नई राजनीतिक सक्रियता और आकाश आनंद के मैदान में उतरने से समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती बढ़ गई है। यही कारण है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने रैली के तुरंत बाद बसपा सुप्रीमो मायावती की बजाय आकाश आनंद को निशाने पर लिया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि आकाश की जरूरत बसपा को नहीं बल्कि भाजपा को है।
यह वही अखिलेश यादव हैं, जिन्होंने कुछ महीने पहले आकाश आनंद को बसपा से हटाए जाने पर मायावती पर भाजपा के दबाव में काम करने का आरोप लगाया था। अब वही अखिलेश, आकाश पर हमला क्यों कर रहे हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इसका सीधा संबंध सपा के पीडीए समीकरण से है। दरअसल, मायावती की इस रणनीति से सपा को डर है कि दलित वोटरों का बड़ा हिस्सा, विशेषकर जाटव समाज, फिर से बसपा की ओर लौट सकता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा–कांग्रेस गठबंधन ने ‘संविधान खतरे में है’ और पीडीए के नारे के जरिए बड़ा दलित–पिछड़ा वोटबैंक अपने पक्ष में किया था। इस चुनाव में गठबंधन को 43 सीटों पर सफलता मिली थी। लोकनीति–सीएसडीएस के सर्वे के अनुसार, तब सपा गठबंधन को नॉन-जाटव दलितों का 56% और जाटवों का 25% वोट मिला था, जबकि बसपा को जाटवों का 44% और नॉन-जाटव का 15% वोट मिला।
अब अगर आकाश आनंद दलित युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल कर लेते हैं और मायावती के नेतृत्व में बसपा का कैडर दोबारा सक्रिय होता है, तो सपा–कांग्रेस के लिए पीडीए की रणनीति दरक सकती है। इसीलिए सपा ने अब अपनी रणनीति बदली है। उन्होंने मायावती की बजाय आकाश को भाजपा का मोहरा साबित करने की कोशिश की है ताकि दलित वोटरों को यह संदेश दिया जा सके कि बसपा अब भाजपा की बी-टीम बन चुकी है।
बसपा की रैली के बाद सपा ने अपने दलित नेताओं को सक्रिय कर दिया है। उन्हें दलित समुदाय के बीच जाकर संवाद करने और उत्पीड़न के मामलों को आक्रामक रूप से उठाने के निर्देश दिए गए हैं। रायबरेली में वाल्मीकि युवक की हत्या का मामला इसका ताजा उदाहरण है, जहां सपा ने तेजी से प्रतिक्रिया दी।
सपा सांसद प्रिया सरोज ने मायावती के भाषण पर पलटवार करते हुए कहा कि यदि वे चाहतीं तो पिछले आठ सालों में भाजपा सरकार से बेरोजगारी और दलितों पर अत्याचार के मुद्दे उठातीं, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी।
दूसरी ओर, भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को जातिवादी राजनीति का नाम दे रही है। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है कि सपा और बसपा दोनों ही दल विकास की बजाय जाति आधारित राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा ने ओबीसी और दलितों के जनधन खाते खुलवाकर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने का काम किया, जबकि सपा–बसपा ने सिर्फ अपना वोटबैंक और बैंक बैलेंस बढ़ाया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर दलित वोटरों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। 2024 में जिस पीडीए फार्मूले ने सपा–कांग्रेस को चुनावी संजीवनी दी थी, उस पर अब बसपा की नई रणनीति ने सीधी चुनौती खड़ी कर दी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आकाश आनंद बसपा को युवाओं के बीच दोबारा प्रासंगिक बना पाएंगे या फिर सपा की रणनीति दलित वोटरों को अपने पक्ष में बनाए रखने में सफल होगी।
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