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“नीलांचल निवासाय नित्याय परमात्मने।
बलभद्र सुभद्राभ्याम् जगन्नाथाय ते नमः॥”

भगवान श्री जगन्नाथ – जो नीलाचल के नित्य निवासी, परमात्मा, परमसत्य और सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान करुणासिन्धु हैं – आज अपनी रथयात्रा में विश्व के प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजते हैं। अद्वैत वेदान्त के अनुसार, सृष्टि, जीव और ईश्वर एक ही अद्वितीय चेतना के अभिव्यक्त रूप हैं। यही भावना रथयात्रा के पर्व में गहराई से निहित है।

यह रथ केवल काष्ठ-पट्टियों से निर्मित एक वाहन नहीं, बल्कि इस देह रूपी रथ में चेतना रूपी सारथी के रूप में स्वयं ब्रह्म परमात्मा प्रतिष्ठित हैं। बलभद्र और सुभद्रा इस सृष्टि के भीतर स्थित ज्ञान-बल और करुणा के प्रतीक हैं, जिनकी उपस्थिति में स्वयं जगन्नाथ रूपी परम-सत्य हृदय के रथ पर आरोहित होते हैं।

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महाप्रभु जगन्नाथ केवल बाह्य रूप से देव ही नहीं, बल्कि अद्वैत ब्रह्म के सगुण रूप हैं। रथयात्रा हमारे भीतर इस सत्य को उद्घाटित करने की यात्रा है कि “अहम् ब्रह्मास्मि” – मैं वही ब्रह्म हूँ, जो सर्वत्र एकरस व्याप्त है। जब मन, बुद्धि, अहंकार से युक्त शरीर रूपी रथ में चेतना रूपी सारथी परमात्मा को स्थापित किया जाता है, तभी ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के पुष्प उस रथ में स्वतः प्रकट होते हैं।

रथयात्रा पर्व केवल बाहरी उत्सव ही नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा है – उस अद्वैत परात्पर ब्रह्म के साक्षात्कार की, जो हमारे भीतर स्थित है। इस पर्व पर हम प्रार्थना करते हैं कि नीलाचल में निवास करने वाले महाप्रभु श्री जगन्नाथ हमारे अंतःकरण में इस अद्वैत तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित हों, जिससे हम संसार में रहते हुए भी ब्रह्ममय दृष्टि से देखें और जीवन को परिपूर्णता से जीएँ।

अद्वैत वेदान्त के प्रकाश में इस पावन पर्व की शुभकामना है कि महाप्रभु भगवान श्री जगन्नाथ जी अपनी करुणामय दृष्टि से हमारे हृदय में ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्मनिष्ठा की अखण्ड ज्योति प्रज्वलित करें।

“रथयात्रा पर्व” की हार्दिक शुभकामनाएँ !