"उपनिषद् के इस मंत्र में ऋषि एक अद्भुत रहस्य खोलते हैं""उपनिषद् के इस मंत्र में ऋषि एक अद्भुत रहस्य खोलते हैं"

श्रीसद्गुरु आशीषवचनम्
— “प्रभुश्री की लेखनी से” —
01 जुलाई, 2025 (मंगलवार)

तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्ध सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ।।
– मुण्डकोपनिषद् २.१.७

उपनिषद् के इस मंत्र में ऋषि एक अद्भुत रहस्य खोलते हैं, वह रहस्य जो सृष्टि के प्रत्येक रूप में उस अद्वितीय परम तत्व को प्रकट करता है।

कल्पना करें ! उस परम चैतन्य की, जिससे इस विराट संसार में विविधता के असंख्य रूप उत्पन्न होते हैं – देवता, सिद्धगण, मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पति, प्राण-अपान, अन्न तथा तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य, यज्ञ जैसी पवित्र साधनाएँ – सभी उसी एक स्रोत से निकले हुए हैं।

भगवद्पाद आदिशंकराचार्य इस मंत्र के भाष्य में कहते हैं कि इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है – स्थूल हो या सूक्ष्म, दृश्य हो या अदृश्य वह उस एक अद्वितीय सत् चैतन्य से ही प्रकट हुआ है। यहाँ कुछ भी पृथक नहीं है, कुछ भी पराया नहीं है।

अद्वैत वेदान्त इस सत्य को और गहराई से प्रकट करता है — जगत के विविध रूप उसी एक चेतना के अभिव्यक्त रूप हैं, ठीक वैसे ही, जैसे सूर्य से किरणें निकलती हैं, पर वे सूर्य से अलग नहीं होतीं।

यह मंत्र हमें बताता है कि श्रद्धा, तप, यज्ञ, कर्म — जो कुछ भी साधना के मार्ग में है — वह भी उसी ब्रह्म से उपजा है, ताकि साधक इस विविध जगत में एकत्व के दर्शन कर सके।

इस उपनिषद् मंत्र की इस गूढ़ शिक्षा से हृदय में अद्वैत का बोध जागृत होता है — “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” — सारा अस्तित्व उसी एक परम तत्व की लीला है।

यही बोध हमारे भीतर भेद-भाव मिटाकर एक व्यापक दृष्टि उत्पन्न करता है, जहाँ साधना जीवन की अभिन्न धारा बन जाती है, और हम इस विराट संसार में प्रत्येक रूप में उसी परमात्मा के दर्शन करते हुए आनन्द, सत्य और मुक्ति का अनुभव करते हैं।

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