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मनमोहन सिंह के साथ काम करने वालों और क़रीबी लोगों ने उन्हें किस तरह से याद किया

मनमोहन सिंह को एक बड़े अर्थशास्त्री और कम बोलने वाले नेता के रूप में पहचाना जाता था। उनकी भूमिका भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले, वह नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे और उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। 1991 में जब भारत एक गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, तब उन्होंने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की दिशा में बड़े फैसले लिए। इन फैसलों ने भारत को वैश्विक स्तर पर एक नई दिशा दी।

मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी, वैश्विक आर्थिक मंदी और महंगाई जैसी समस्याओं से जूझते हुए उन्होंने देश का नेतृत्व किया। उनकी सरकार ने कई महत्वपूर्ण नीतियां बनाई, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर करने में मददगार साबित हुईं।

मनमोहन सिंह की राजनीति में संयम और स्थिरता

मनमोहन सिंह को एक संयमित और विचारशील नेता के रूप में जाना जाता था। वह हमेशा संतुलित तरीके से निर्णय लेते थे, और उनके फैसले देश की दीर्घकालिक भलाई के लिए होते थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक शैली में कभी भी उत्तेजना या अप्रिय शब्दों का प्रयोग नहीं किया, और अपने विरोधियों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार किया। उनकी शांत स्वभाव और गंभीर दृष्टिकोण ने उन्हें एक सक्षम और भरोसेमंद नेता के रूप में स्थापित किया।

हरीश खरे की श्रद्धांजलि

मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उनके मीडिया सलाहकार रहे हरीश खरे ने उन्हें याद करते हुए एक लेख लिखा। हरीश खरे ने अपने लेख में मनमोहन सिंह की एक महत्वपूर्ण विशेषता पर प्रकाश डाला, जो थी उनके मीडिया के प्रति सम्मान। हरीश खरे ने लिखा कि मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के प्रधानमंत्री पद के दौरान उन पर मीडिया के तीखे और कभी-कभी अनुचित हमले हुए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कभी भी मीडिया की स्वतंत्रता को दबाने की कोशिश नहीं की। वे मानते थे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए जरूरी है।

मनमोहन सिंह ने हमेशा पत्रकारों के साथ एक स्वस्थ और खुले संवाद को बढ़ावा दिया। उन्होंने मीडिया के स्वतंत्र संस्थानों के महत्व को समझा और उनका सम्मान किया। यह उनके लोकतांत्रिक दृष्टिकोण का प्रतीक था कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कभी भी मीडिया को दबाने या अपमानित करने की कोशिश नहीं की।

असीम अरुण की यादें

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बिताए गए समय को याद करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री असीम अरुण ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा। असीम अरुण 2004 में एसपीजी में थे और मनमोहन सिंह की सुरक्षा में तैनात थे। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए लिखा, “मैं 2004 से लगभग तीन साल तक मनमोहन सिंह का बॉडीगार्ड रहा। एसपीजी में पीएम की सुरक्षा का सबसे अंदरूनी घेरा होता है – क्लोज़ प्रोटेक्शन टीम। इस टीम का नेतृत्व करने का अवसर मुझे मिला था।”

उन्होंने यह भी बताया कि एसपीजी में रहते हुए, पीएम की सुरक्षा का सबसे बड़ा जिम्मा उनके कंधों पर था। “मैं हमेशा डॉक्टर साहब के साथ था, उनके सबसे करीब। अगर एक ही बॉडीगार्ड साथ रहता, तो वह मैं ही होता। उनके साथ उनका छाया बनने की जिम्मेदारी थी मेरी,” असीम अरुण ने लिखा।

मनमोहन सिंह की सादगी

असीम अरुण ने मनमोहन सिंह की सादगी का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री के पास सिर्फ एक ही कार थी – मारुति 800। यह कार प्रधानमंत्री हाउस की बड़ी और चमचमाती काली बीएमडब्ल्यू के सामने खड़ी रहती थी। असीम अरुण ने लिखा, “डॉक्टर साहब बार-बार मुझे कहते थे, ‘असीम, मुझे इस कार में चलना पसंद नहीं, मेरी गड्डी तो यह है (मारुति)।'” यह एक ऐसी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण घटना थी जो मनमोहन सिंह की जीवनशैली और उनके मिडिल क्लास मूल्यों को दर्शाती है।

असीम अरुण ने बताया कि जब वह मनमोहन सिंह को समझाते थे कि यह कार उनके ऐश्वर्य के लिए नहीं है, बल्कि सुरक्षा कारणों से एसपीजी द्वारा इसे चुना गया है, तो वह हमेशा कहते थे कि उनकी प्राथमिकता आम आदमी की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना था। “करोड़ों की गाड़ी प्रधानमंत्री की है, लेकिन मेरी गाड़ी तो यही मारुति है,” मनमोहन सिंह का यह वाक्य उनकी सादगी और आम जनता के प्रति उनकी चिंता को बखूबी दर्शाता है।

एक महान नेता की विरासत

मनमोहन सिंह के योगदान को केवल उनकी नीतियों और फैसलों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली के माध्यम से भी याद किया जाएगा। वह एक ऐसे नेता थे जिन्होंने हमेशा अपने देश के सर्वोत्तम हित में काम किया और कभी भी अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को अपने कार्य से ऊपर नहीं रखा। उनका विश्वास था कि देश की तरक्की केवल अच्छे नेतृत्व और नीति निर्धारण से संभव है, न कि राजनीतिक जोड़-तोड़ और प्रचार से।

मनमोहन सिंह का निधन देश के लिए एक बड़ी क्षति है, लेकिन उनकी विरासत हमेशा हमारे साथ रहेगी। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि कर्मों से साबित होता है। वह हमेशा भारत की सेवा में प्रतिबद्ध रहे और उनकी नीतियां आज भी भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था पर असर डाल रही हैं।

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