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गुरुग्राम  जहां मल्टीनेशनल कंपनियों के आलीशान दफ्तर हैं, जहां करोड़ों के लग्ज़री फ्लैट बेचे जाते हैं, जहां शहरीकरण की रफ्तार देश के किसी भी शहर से तेज़ है। उसी गुरुग्राम की असलियत एक बारिश ने फिर उजागर कर दी। जैसे ही जुलाई में मानसून की पहली तेज बारिश हुई, गुरुग्राम की सड़कों ने घुटनों तक पानी ओढ़ लिया। लोगों की लग्जरी गाड़ियां बीच सड़क पर फंस गईं, कुछ लोग तो गाड़ियों को छोड़कर पानी में तैरते दिखाई दिए। यह कोई पहली बार की कहानी नहीं है, बल्कि हर साल का वही घिसा-पिटा नजारा दिखाई देता है। बारिश हुई और गुरुग्राम डूब गया। गोल्फ कोर्स रोड पर 190 करोड़ के फ्लैट बेचने का दावा करने वाले बिल्डर क्या जवाब देंगे उन खरीदारों को, जिनके घर के बाहर झील जैसा नज़ारा बन गया है? सुशांत लोक जैसे पॉश इलाकों के घरों में पानी घुस गया है, सड़कों पर गड्ढे और गंदगी का अंबार लग गया है। सोशल मीडिया पर लोग बेहाल तस्वीरें और वीडियो पोस्ट कर रहे हैं, जो प्रशासन और नगर निगम के खोखले दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं।

कहां जाता है करोड़ों का बजट ?

अब सवाल ये है कि आखिर करोड़ों के बजट, स्मार्ट सिटी के वादों, और मेट्रोपोलिटन टाउनशिप के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के बावजूद गुरुग्राम का ड्रेनेज सिस्टम हर बार क्यों फेल हो जाता है? नगर निगम और जीएमडीए हर साल नालों की सफाई के दावे करते हैं, लेकिन नतीजा वही “सुनवाई शून्य, जलभराव 100%।” बारिश के बाद सड़कों पर सिर्फ पानी नहीं बहता, बहती है सरकारी उदासीनता, निकम्मापन और लापरवाही की बदबू आती है। तेज़ी से हुआ शहरीकरण और बिना प्लानिंग के उग आईं कॉलोनियां अब गुरुग्राम की गर्दन पर बोझ बन चुकी हैं। स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम का कोई ठोस प्लान नहीं है, सड़कों पर बना हर गड्ढा प्रशासन की नाकामी का गवाह है। गुरुग्राम सिर्फ दिखावे की चमक है—वास्तविकता में एक अव्यवस्थित, अराजक और बेहाल शहर।

ऑफिस टाइम में बारिश से होती हैं परेशानियां

जब ऑफिस टाइम में बारिश होती है तो पूरा शहर ठप हो जाता है। 9 जुलाई की बारिश ने शाम को लाखों लोगों को घंटों जाम में फंसा दिया। किसी ने गाड़ी में बैठकर रास्ता ढूंढा, तो किसी ने ऑफिस से घर पहुंचने में 3 घंटे लगाए। और सरकार? वह तो हमेशा की तरह  ‘स्थिति पर नजर बनाए हुए है।’ गुरुग्राम की रियल एस्टेट मार्केट देश की सबसे तेज़ रफ्तार से बढ़ने वाली मार्केट है। यहां 50 लाख की प्रॉपर्टी 10 साल में 2.24 करोड़ तक पहुंच गई है। मुंबई, बैंगलोर को पीछे छोड़ चुका है गुरुग्राम, लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ निवेश और रिटर्न से शहर जिंदा रहता है?लोगों को रहने के लिए सुरक्षित सड़कें चाहिए, साफ पानी, बिजली और जल निकासी की व्यवस्था चाहिए—ना कि बस कंक्रीट के डिब्बों में बंद “लक्ज़री फ्लैट्स”।हर साल यही कहा जाता है: “इस बार थोड़ा ज्यादा पानी गिरा था”, “जल्द ही नालों की सफाई होगी”, “प्रशासन सतर्क है”।

सड़क पर कब तक गाड़ियां तैरती रहेंगी ?

लेकिन सवाल ये है कि कब तक?गुरुग्राम की जनता अब जाग चुकी है। अब सिर्फ बुलेट पॉइंट प्रेस नोट नहीं चलेंगे, ज़मीन पर बदलाव चाहिए। वरना वो दिन दूर नहीं जब लोग इस “मिलेनियम सिटी” से भरोसा उठाकर दूसरी जगहों पर बसने लगेंगे। गुरुग्राम का हाल इस समय देश की व्यवस्था के चेहरे पर एक तमाचा है। करोड़ों की संपत्तियां, मल्टीनेशनल कंपनियां, और मेट्रोपॉलिटन ग्लैमर—सब बारिश की एक रात में धराशायी हो जाता है। सरकार और नगर प्रशासन को अब समझना होगा कि स्मार्ट सिटी सिर्फ ब्रॉशर छपवाने से नहीं बनती, बल्कि ज़मीन पर स्मार्ट प्लानिंग, ईमानदार क्रियान्वयन और जनता के प्रति जवाबदेही से बनती है। वरना गुरुग्राम जैसी चमकदार शहर की तस्वीरें सिर्फ सोशल मीडिया पर “तालाब में तैरती गाड़ियों” के साथ वायरल होती रहेंगी।

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