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मुंबई में रहना है तो मराठी सीखनी पड़ेगी? ड्राइवरों को मिला 1 साल का वक्त!

मुंबई में रहना है तो मराठी सीखनी पड़ेगी….और पिछले दिनों आपने इससे जुड़े तमाम वीडियो देखे होंगे… और उनपर बवाल भी देखा है… लेकिन, मुंबई में ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और कैब चलाने वाले ड्राइवरों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है…. महाराष्ट्र सरकार ने अनिवार्य मराठी भाषा नियम को लेकर ड्राइवरों को एक साल का अतिरिक्त समय देने का फैसला किया है… यानी अब ड्राइवरों को तुरंत मराठी सीखने को लेकर कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा… सरकार ने उन्हें बुनियादी और व्यावहारिक मराठी सीखने के लिए एक साल का और वक्त दिया है… ये फैसला महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ऑटो और टैक्सी ड्राइवर यूनियन के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बैठक के बाद लिया गया है… सरकार का कहना है कि उसका मकसद किसी की रोजी-रोटी छीनना नहीं है। लेकिन साथ ही ये भी साफ कर दिया गया है कि महाराष्ट्र में काम करने वाले ड्राइवरों को स्थानीय भाषा का बुनियादी ज्ञान होना चाहिए… तो आखिर पूरा मामला क्या है?… ड्राइवरों को एक साल की राहत क्यों दी गई? मराठी सीखने के लिए सरकार क्या व्यवस्था करने जा रही है? और सबसे बड़ा सवाल क्या एक साल बाद मराठी नहीं आने पर कार्रवाई होगी? इन तमाम सवालों का जवाब आपको इस रिपोर्ट में मिलेगा… दरअसल, मुंबई जैसे शहर में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग रोजगार की तलाश में आते हैं… ऑटो और टैक्सी चलाने वाले भी अलग-अलग राज्यों और भाषाई पृष्ठभूमि से आते हैं… ऐसे में मराठी भाषा को लेकर काफी समय से चर्चा होती रही है… महाराष्ट्र सरकार का तर्क है कि जो लोग यहां रहते हैं और लोगों से सीधे संपर्क वाले काम करते हैं, उन्हें कम से कम इतनी मराठी जरूर आनी चाहिए कि वो यात्रियों से सामान्य बातचीत कर सकें और रोजमर्रा की जरूरतों को समझ सकें… लेकिन दूसरी तरफ ऑटो और टैक्सी यूनियनों की चिंता ये रही है कि अगर मराठी भाषा की अनिवार्यता को तुरंत लागू किया गया, तो बड़ी संख्या में ड्राइवरों पर कार्रवाई का खतरा पैदा हो सकता है। इसी मुद्दे को लेकर ड्राइवर यूनियन के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की…और बैठक में सरकार ने एक साल की अतिरिक्त मोहलत देने का फैसला किया…अब यहां एक बात समझना जरूरी है…. सरकार ने मराठी सीखने की शर्त को खत्म नहीं किया है। बल्कि ड्राइवरों को इसे पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया है। यानी फिलहाल राहत है, लेकिन नियम से पूरी तरह छूट नहीं… सरकार की योजना है कि इस एक साल के दौरान ड्राइवरों को बुनियादी और काम चलाऊ मराठी सिखाई जाए… इसके लिए करीब 180 क्लास चलाने की बात कही गई है… यानी ड्राइवरों को साहित्यिक या कठिन मराठी नहीं पढ़ाई जाएगी… फोकस इस बात पर रहेगा कि वो यात्रियों से सामान्य बातचीत कर सकें, पता और रास्ता समझ सकें, किराए या यात्रा से जुड़ी सामान्य बातों को समझ सकें और जरूरत पड़ने पर अपनी बात भी रख सकें… इसी को सरकार ने ‘काम चलाऊ मराठी’ या बुनियादी व्यावहारिक मराठी सीखने के तौर पर सामने रखा है… और खास बात ये है कि इस पहल को लेकर सरकार का दावा है कि ड्राइवर भी इसका समर्थन कर रहे हैं और मराठी सीखने की प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं। वहीं, परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने साफ तौर पर कहा है कि ये फैसला किसी की रोजी-रोटी छीनने के लिए नहीं है… उनके मुताबिक महाराष्ट्र रोजगार देने वाला राज्य है और सरकार चाहती है कि यहां काम करने वाले लोगों का महाराष्ट्र की मिट्टी और भाषा से जुड़ाव हो… मंत्री की इस बात का मतलब साफ है.. कि सरकार मराठी भाषा को लेकर सख्ती के बजाय फिलहाल ट्रेनिंग और समय देने के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। लेकिन इसी बयान में एक दूसरा संदेश भी है… सरकार ने ये भी कहा है कि एक साल के बाद अगर कोई ड्राइवर ये कहता है कि उसे अभी और समय चाहिए, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है… अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार मराठी पर इतना जोर क्यों दे रही है? देखिए, ऑटो और टैक्सी ड्राइवर सीधे जनता से जुड़े होते हैं। हर दिन लाखों यात्री इनके जरिए सफर करते हैं। यात्रियों में स्थानीय लोग भी होते हैं और देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले लोग भी… ऐसे में सरकार का कहना है कि ड्राइवर को कम से कम स्थानीय भाषा की बुनियादी जानकारी होनी चाहिए… दूसरी तरफ इस फैसले को लेकर ये सवाल भी उठता है कि भाषा सीखने की जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ सरकार को ड्राइवरों की व्यावहारिक परेशानियों को भी ध्यान में रखना होगा… क्योंकि ज्यादातर ड्राइवर रोजाना कई घंटे सड़क पर रहते हैं। उनके लिए अतिरिक्त समय निकालना भी आसान नहीं होता… इसलिए सरकार की ओर से क्लास की व्यवस्था किया जाना इस पूरे फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है…अगर ड्राइवरों को आसानी से उपलब्ध ट्रेनिंग मिलती है, समय उनके काम के हिसाब से तय होता है और उन्हें व्यावहारिक तरीके से भाषा सिखाई जाती है, तो इस फैसले को लागू करना आसान हो सकता है।
वहीं, ऑटो-रिक्शा और टैक्सी ड्राइवरों का कहना है कि वो मराठी पहले से समझते हैं और रोजमर्रा की बातचीत में इसका इस्तेमाल भी करते हैं। कुछ ड्राइवरों को सिर्फ बोलने और पढ़ने में परेशानी है। ऐसे लोगों के लिए एक साल की मोहलत काफी महत्वपूर्ण हो सकती है। वहीं कुछ ड्राइवर ऐसे भी हैं, जो लंबे समय से मुंबई में काम कर रहे हैं लेकिन उनकी मातृभाषा मराठी नहीं है। उनके लिए ये एक साल सीखने और खुद को तैयार करने का मौका है… अब यहां राजनीति भी है और भाषा का सवाल भी… महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी भाषा और स्थानीय पहचान का मुद्दा नया नहीं है। समय-समय पर ये मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आता रहा है… लेकिन इस बार सरकार की तरफ से जो संदेश दिया जा रहा है, वो ये है कि भाषा सीखना जरूरी है, लेकिन इसके लिए लोगों को समय भी दिया जाएगा… यानी सरकार एक तरफ मराठी के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहती है, तो दूसरी तरफ ये भी कह रही है कि किसी की नौकरी या रोजी-रोटी अचानक खत्म नहीं की जाएगी… और शायद यही इस पूरे फैसले की सबसे अहम बात है। क्योंकि एक तरफ स्थानीय भाषा के सम्मान और इस्तेमाल की बात है, तो दूसरी तरफ उन हजारों ड्राइवरों की रोजी-रोटी का सवाल है जो मुंबई की सड़कों पर दिन-रात काम करते हैं। सरकार ने फिलहाल एक साल का समय देकर दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है… अब सवाल आपसे… क्या महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों के लिए बुनियादी मराठी सीखना जरूरी होना चाहिए? क्योंकि अगर हम बात करें, पंजाब… हरियाणा…राजस्थान… बिहार… या अन्यू दूसरे राज्यों में वहां की भाषा सीखना जरूरी कर दिया जाए… तो कोई भी दूसरे राज्यों में जाकर गुजरबसर नहीं कर पाएगा…

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