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हिमाचल प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राज्य में एक अनुभवी और रणनीतिक नेता को दोबारा कमान सौंपते हुए डॉ. राजीव बिंदल को तीसरी बार प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। मंगलवार को शिमला के प्रतिष्ठित पीटरहॉफ भवन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने उनकी नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा की। इसके साथ ही पार्टी ने 8 राष्ट्रीय परिषद सदस्यों के नामों की भी घोषणा की, जिनमें हिमाचल के कई वरिष्ठ चेहरे शामिल हैं। अब बिंदल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है — 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को फिर से सत्ता में लाना, और यह जिम्मेदारी उन्हें ऐसे समय में मिली है जब पार्टी अंदरूनी खींचतान और संगठनात्मक असंतुलन से जूझ रही है। हिमाचल भाजपा में अध्यक्ष पद के लिए इस बार कई नामों की चर्चा थी। लेकिन कई अहम कारणों की वजह से पार्टी ने राजीव बिंदल को एक बार फिर मौका देने का फैसला किया:

राजीव बिंदल को किस-किसका समर्थन ? 

  1. जेपी नड्डा का समर्थन: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हिमाचल के ही बेटे जगत प्रकाश नड्डा का पूरा समर्थन बिंदल को मिला। यह एक अहम कारण रहा।
  2. RSS से गहरा जुड़ाव: राजीव बिंदल बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े हुए हैं। संघ ने भी बिंदल के नाम को समर्थन देते हुए हाईकमान के सामने उनकी सिफारिश की थी।
  3. धूमल और अनुराग ठाकुर का भरोसा: पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर जैसे कद्दावर नेताओं ने भी बिंदल के नाम पर सहमति जताई। इससे संगठन में व्यापक समर्थन मिला।
  4. राजनीतिक और रणनीतिक समझ: बिंदल को एक ऐसा नेता माना जाता है जो संगठन को ज़मीनी स्तर तक समझते हैं। उन्हें कार्यकर्ताओं से संवाद करना आता है और राजनीतिक संतुलन साधने में भी वो माहिर हैं।
  5. विधानसभा अनुभव: राजीव बिंदल 5 बार विधायक रह चुके हैं। तीन बार सोलन और दो बार नाहन से। उन्होंने न केवल शहरी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी मजबूत पकड़ बनाई है।

अनुभव, संगठन की समझ की वजह से मिली जिम्मेदारी 

भाजपा में इस बार अध्यक्ष पद के लिए महिला, ब्राह्मण, या एससी समुदाय से किसी चेहरे को लाने की चर्चा थी। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि पार्टी सामाजिक संतुलन साध सके और आगामी चुनावों के लिए रणनीतिक बढ़त बना सके। हालांकि आखिर में पार्टी ने इन तमाम समीकरणों से हटकर अनुभव, संगठन की समझ और राजनीतिक संतुलन को तरजीह दी, और बिंदल को जिम्मेदारी सौंपी। डॉ. बिंदल जब पहली बार हिमाचल भाजपा के अध्यक्ष बने थे, उस समय कोविड-19 महामारी का दौर था। PPE किट की खरीद में अनियमितताओं के आरोप उन पर लगे, जिसके चलते उन्होंने मoral ground पर इस्तीफा दे दिया।हालांकि, बाद में भाजपा सरकार ने उन्हें क्लीन चिट दे दी और यह माना गया कि वे व्यक्तिगत रूप से किसी भ्रष्टाचार में शामिल नहीं थे। यह बात पार्टी के शीर्ष नेताओं ने भी स्वीकार की।

भाजपा को फिर से सत्ता दिलाना बिंदल की सबसे बड़ी परीक्षा 

राजीव बिंदल 2022 में नाहन सीट से कांग्रेस के अजय सोलंकी से चुनाव हार गए, लेकिन इसके बावजूद संगठन में उनका वर्चस्व बना रहा। उन्होंने लगातार कार्यकर्ताओं से संवाद बनाए रखा और पार्टी की गतिविधियों में सक्रियता दिखाई। यही वजह रही कि हार के बावजूद पार्टी ने उन्हें फिर से प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। राज्य में भाजपा को फिर से सत्ता दिलाना अब बिंदल की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। उन्हें यह कार्य नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के साथ मिलकर करना होगा, जिनके साथ मतभेद की खबरें पहले भी आती रही हैं।हालांकि भाजपा आलाकमान को भरोसा है कि बिंदल अपनी समन्वय क्षमता और संगठन पर पकड़ के ज़रिए पार्टी को एकजुट रखेंगे और आगामी चुनाव में सफलता की ओर ले जाएंगे।राजीव बिंदल की तीसरी पारी भाजपा के लिए निर्णायक हो सकती है। उनका अनुभव, रणनीतिक सोच और संगठनात्मक पकड़ उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त बनाते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि क्या वह भाजपा को 2027 में एक बार फिर से हिमाचल की सत्ता तक पहुंचा पाएंगे।