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इजराइल और बापू: महात्मा गांधी की दृष्टि पर एक नजर

महात्मा गांधी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता, अपने विचारों और सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं। उनका जीवन शांति, अहिंसा, और मानवता की सेवा का प्रतीक रहा है। हालांकि, जब बात यहूदियों के लिए फिलिस्तीन में अलग देश की मांग की होती है, तो उनकी राय थोड़ी भिन्न थी। गांधी यहूदियों के प्रति गहरी सहानुभूति रखते थे, लेकिन उन्होंने उनके लिए एक अलग देश की मांग को पूरी तरह खारिज किया।

गांधी का यहूदी समुदाय के प्रति दृष्टिकोण

गांधी यहूदियों के प्रति अपने विचारों में सहानुभूति रखते थे, खासकर जब उन्होंने नाज़ियों के अत्याचारों के बारे में सुना। लेकिन उनका मानना था कि एक पृथक यहूदी राष्ट्र की स्थापना फिलिस्तीन में अरबों की भूमि पर एक अन्याय होगा। उनका कहना था कि जैसे इंग्लैंड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रांसीसियों का है, वैसे ही फिलिस्तीन अरबों का है।

गांधी का यह भी मानना था कि धार्मिक आधार पर किसी भी अलग देश की मांग गलत है। उनका तर्क था कि भारत में मुसलमानों की मांग भी इसी प्रकार की थी, जिसके तहत देश का विभाजन किया गया। वे मानते थे कि यहूदियों को उनके वर्तमान निवास स्थान पर ही सम्मानपूर्वक रहना चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।

गांधी के लेख और विवाद

गांधी का एक महत्वपूर्ण लेख “The Jews” 1938 में ‘हरिजन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, जिसमें उन्होंने यहूदियों की समस्या का गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने लिखा कि यहूदियों की समस्या को समझना आवश्यक है, लेकिन अलग देश की मांग के खिलाफ थे। उनका तर्क था कि संगीनों और बमों के बल पर यहूदियों की फिलिस्तीन वापसी धार्मिक कृत्य नहीं होगा।

गांधी ने यह भी पूछा कि अगर यहूदियों को फिलिस्तीन चाहिए, तो क्या इसका मतलब यह है कि वे जहां रह रहे हैं, वहां से उजड़ने के लिए तैयार हैं? उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर यहूदियों को अलग देश की मांग करने का हक है, तो क्या ऐसा नहीं होगा कि इसी आधार पर उन्हें अन्य देशों से भी निकाला जाए?

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, पंडित नेहरू की सरकार ने भी गांधी के विचारों को अपनाया। भारत ने फिलिस्तीन के बंटवारे के प्रस्ताव का विरोध किया। यद्यपि 1950 में भारत ने इजराइल को मान्यता दी, लेकिन कूटनीतिक संबंध 1992 में ही स्थापित हुए।

गांधी की अहिंसा का संदेश

गांधी की सोच में यहूदियों के प्रति सहानुभूति का गहरा आधार था, लेकिन वह किसी भी तरह के युद्ध या संघर्ष के खिलाफ थे। उन्होंने यह स्वीकार किया कि जर्मनी में यहूदियों के साथ जो अत्याचार हुआ, वह मानवता के लिए शर्मनाक था। हालांकि, वे युद्ध के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उन्होंने इसे एक ऐसे बुरे समय में उचित ठहराया, जब मानवता को बचाने के लिए संघर्ष करना आवश्यक हो गया था।

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