कोटा मेडिकल कॉलेज की त्रासदी: ‘सरकारी लापरवाही’ बनाम ‘कांग्रेस की जांच’ क्या मिल पाएगा पीड़ितों को न्याय? राजस्थान का ‘शिक्षा का केंद्र’ कहा जाने वाला कोटा शहर इस वक्त एक ऐसी हृदय विदारक घटना के कारण सुर्खियों में है, जिसने प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल कर रख दी है।
कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में डिलीवरी के बाद दो माताओं की मौत और आधा दर्जन महिलाओं की किडनी फेल होने की घटना ने न केवल सरकार के दावों को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि पूरे प्रदेश में आक्रोश की लहर पैदा कर दी है। इस मामले में अब राजनीति भी गरमा गई है, जहां कांग्रेस ने इसे ‘सरकारी हत्या’ करार देते हुए अपनी खुद की जांच टीम मैदान में उतार दी है।
ऐसे में ये जानना जरूरी है कि, आखिर ये पूरा मामला है क्या?
कोटा न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रसूति विभाग में हाल ही में सीजेरियन सेक्शन के माध्यम से कई महिलाओं की डिलीवरी हुई थी। ऑपरेशन के कुछ ही समय बाद, एक-एक करके महिलाओं की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। अस्पताल में भर्ती 6 महिलाओं की किडनी ने काम करना बंद कर दिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि इनमें से दो महिलाओं ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया…बची चार महिलाएं फिलहाल डायलिसिस पर हैं।
प्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट की मानें तो ये मामला ‘सेप्टीसीमिया’ या ऑपरेशन थिएटर में फैले किसी घातक इंफेक्शन का हो सकता है। इसके अलावा, सर्जरी के दौरान इस्तेमाल की गई दवाइयों या एनेस्थीसिया के ‘एडवर्स रिएक्शन’ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
इसी बीच, अस्पताल की जर्जर स्थिति तब और उजागर हो गई जब क्षेत्रीय भाजपा विधायक संदीप शर्मा पीड़ितों को सांत्वना देने पहुंचे, लेकिन वे खुद अस्पताल की लिफ्ट में काफी देर तक फंसे रह गए। ये घटना अस्पताल के बुनियादी ढांचे की खस्ताहाली का जीता-जागता सबूत बन गई।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इस मामले में सरकार की आधिकारिक जांच पर भरोसा न जताते हुए एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया है। कांग्रेस का तर्क है कि सरकारी जांच अक्सर लीपापोती का शिकार हो जाती है। पार्टी ने इस कमेटी के लिए ऐसे चेहरों को चुना है, जो प्रशासनिक और चिकित्सीय क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। परसादी लाल मीणा (पूर्व स्वास्थ्य मंत्री): इन्हें स्वास्थ्य ढांचे की बारीकियों और लूप होल्स की गहरी समझ है।
डूंगर राम गैदर (वरिष्ठ विधायक): इन्हें जमीनी स्तर पर तथ्यों को खंगालने और सदन में आवाज उठाने की जिम्मेदारी दी गई है।
पुष्पेंद्र भारद्वाज (प्रभारी महासचिव, कोटा जिला): ये स्थानीय स्तर पर पीड़ित परिवारों से मिलकर सबूत और बयान जुटाएंगे। विकास महला (अध्यक्ष, चिकित्सा प्रकोष्ठ): इनका काम तकनीकी और मेडिकल ऑडिट करना होगा कि आखिर ओटी में इंफेक्शन फैला कैसे और दवाओं की गुणवत्ता क्या थी?
कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि ये कमेटी केवल औपचारिकता नहीं करेगी। इसलिए टीम को तुरंत कोटा भेजा गया है और 3 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
पूर्व स्वास्थ्य मंत्री परसादी लाल मीणा ने सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर हमला बोलते हुए पूछा है कि अगर व्यवस्थाएं चाक-चौबंद हैं, तो अस्पताल ‘बूचड़खाना’ क्यों बनते जा रहे हैं? विपक्ष ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं।
क्या अस्पताल प्रशासन ने शुरुआत में मौतों के आंकड़े छुपाने की कोशिश की?
क्या विधायक के दौरे के दौरान डॉक्टर का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और हंसी किसी गहरे राज को रफा-दफा करने का संकेत थी? क्या दवाओं की खरीद में कमीशनखोरी के चलते निम्न स्तर की दवाओं का इस्तेमाल हुआ? एक तरफ खुशियों की उम्मीद में आए परिवारों ने अपने सदस्यों को खो दिया है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक तंत्र जांच-जांच के खेल में उलझा हुआ है। राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर देश भर में मिसाल दी जाती रही है, लेकिन कोटा की इस घटना ने उन दावों को लहूलुहान कर दिया है।
कांग्रेस की ये सक्रियता जहां सरकार पर दबाव बनाएगी, वहीं जनता ये उम्मीद कर रही है कि राजनीति से ऊपर उठकर इस लापरवाही के असली दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए… क्या प्रदेश की भाजपा सरकार इन ‘सरकारी हत्याओं’ की जवाबदेही तय कर पाएगी? ये आने वाले दिनों में कांग्रेस की रिपोर्ट और सरकार की कार्रवाई से साफ होगा।
