उत्तर प्रदेश की राजनीति में ‘कुंडा के सुल्तान’ कहे जाने वाले बाहुबली नेता और जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के प्रमुख रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का पारिवारिक और राजनीतिक हलका इन दिनों अदालती कार्रवाई को लेकर चर्चा में है। ताजा घटनाक्रम में, राजा भैया की पत्नी भानवी सिंह द्वारा दायर धोखाधड़ी के एक मामले में लखनऊ कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने एमएलसी अक्षय प्रताप सिंह समेत चार आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं।
लखनऊ की अदालत ने इंस्पेक्टर हजरतगंज को कड़ा निर्देश दिया है कि इस मामले में अक्षय प्रताप सिंह, रोहित प्रताप सिंह, अनिल सिंह और रामदेव यादव के खिलाफ संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया जाए… कोर्ट ने न केवल FIR दर्ज करने को कहा है, बल्कि पुलिस को उचित कानूनी कार्रवाई शुरू कर रिपोर्ट पेश करने का भी निर्देश दिया है। ये आदेश राजा भैया के खेमे के लिए एक बड़ा कानूनी झटका माना जा रहा है, क्योंकि अक्षय प्रताप सिंह को राजा भैया का बेहद करीबी और दाहिना हाथ माना जाता रहा है।
चलिए, जानते हैं क्या है पूरा विवाद?
इस कानूनी लड़ाई की नींव एक साझेदारी फर्म और उससे जुड़ी करोड़ों की बेनामी और कीमती संपत्तियों पर टिकी है। भानवी सिंह की ओर से कोर्ट में पेश की गई याचिका के अनुसार भानवी सिंह ने 10 फरवरी 2014 को एक साझेदारी फर्म बनाई थी। इस फर्म के पोर्टफोलियो में लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में करीब 5 करोड़ रुपये की संपत्तियां दर्ज थीं।
वहीं, भानवी सिंह का आरोप है कि अक्षय प्रताप सिंह और उनके सहयोगियों ने उनकी अनुपस्थिति या जानकारी के बिना एक गहरी साजिश रची। और याचिका में कहा गया है कि नवंबर 2020 में फर्म के आधिकारिक दस्तावेजों में हेरफेर की गई। फर्म का रजिस्टर्ड पता बदलकर अक्षय प्रताप सिंह ने अपना निजी आवास दर्ज करा लिया। भानवी सिंह का दावा है कि दस्तावेजों में ये ‘जालसाजी’ केवल पते तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य फर्म के नाम पर दर्ज कीमती संपत्तियों को अवैध रूप से अपने नियंत्रण में लेना या हड़पना था।
ये कानूनी लड़ाई पिछले काफी समय से कई चरणों से गुजर रही है:
सबसे पहले भानवी सिंह ने लखनऊ की ACJM कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी लेकिन, मामले की गंभीरता और आरोपी के जन-प्रतिनिधि होने के कारण MP-MLA कोर्ट ने इस पर परिवाद चलाने का आदेश दिया… लेकिन भानवी सिंह चाहती थीं कि मामले की जांच निष्पक्ष और कोर्ट की सीधी देखरेख में हो, इसलिए उन्होंने निगरानी याचिका दाखिल की। इस कानूनी घेराबंदी के खिलाफ अक्षय प्रताप सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में याचिका दायर कर राहत की मांग की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया और सेशन कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिससे उनके लिए मुश्किलें बढ़ गईं।
ऐसे में अब जानते हैं आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट से राहत न मिलने और लखनऊ की निचली अदालत के ताजा सख्त आदेश के बाद अब गेंद हजरतगंज पुलिस के पाले में है। पुलिस की ओर से मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद आरोपियों से पूछताछ हो सकती है। साक्ष्यों के आधार पर गिरफ्तारी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। अक्षय प्रताप सिंह MLC हैं और जनसत्ता दल के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इस मामले ने राजा भैया और उनकी पत्नी के बीच चल रहे व्यक्तिगत विवाद को भी सार्वजनिक पटल पर कानूनी मोड़ दे दिया है।
पुलिस अब उन हस्ताक्षरों और दस्तावेजों की जांच करेगी, जिनके जरिए फर्म का पता बदला गया और कथित जालसाजी की गई। ये मामला न केवल करोड़ों की संपत्ति के विवाद का है, बल्कि ये उत्तर प्रदेश के एक रसूखदार राजनीतिक परिवार के भीतर बढ़ती दरार और कानूनी खींचतान का भी प्रतीक बन गया है… अब देखना ये है कि पुलिस की जांच में क्या नए तथ्य सामने आते हैं और अक्षय प्रताप सिंह इस कानूनी चक्रव्यूह से कैसे निकलते हैं।
