Maharashtra NCP(SP): क्या महाराष्ट्र में बदल रही है NCP(SP) की रणनीति?Maharashtra NCP(SP): क्या महाराष्ट्र में बदल रही है NCP(SP) की रणनीति?

Maharashtra NCP(SP): क्या महाराष्ट्र में बदल रही है NCP(SP) की रणनीति?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राज्य के 29 नगर निगम चुनावों, जिनमें बीएमसी  का चुनाव सबसे अहम माना जाता है, उसका ऐलान होते ही सियासी समीकरण बदलने लगे हैं। इस बीच एनसीपी (शरद पवार गुट) के प्रमुख शरद पवार का मुंबई से बाहर रहना, उनकी बेटी और सांसद सुप्रिया सुले की केंद्र के साथ नजदीकी ने कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट के वरिष्ठ सांसद संजय राउत ने इस मुद्दे को सबसे पहले उठाते हुए पूछा कि, “जब महाराष्ट्र की राजनीति तय दिशा में आगे बढ़ रही है, तो शरद पवार मुंबई से दूरी क्यों बनाए हुए हैं?” उन्होंने ये भी जोड़ा कि पवार को ये साफ करना चाहिए कि वे डिप्टी सीएम अजित पवार के साथ रिश्तों को लेकर क्या सोचते हैं।

शरद पवार का मुंबई के बाहर रहना केवल उनकी राजनीतिक दिनचर्या से जुड़ा मामला नहीं माना जा रहा। पवार परिवार के अंदर पिछले कुछ महीनों में जो बदलाव हुए हैं, उन्होंने पूरे राज्य की सियासत को नए दौर में पहुंचा दिया है।

संजय राउत का कहना है कि, बीएमसी चुनाव के वक्त शरद पवार की अनुपस्थिति ये संकेत देती है कि NCP (SP) की रणनीति अब पारंपरिक महाविकास अघाड़ी (MVA) से अलग भी हो सकती है। राउत ने कहा कि जब शरद पवार मुंबई लौटेंगे, तब सीट शेयरिंग और गठबंधन के मुद्दे पर बातचीत की जाएगी, लेकिन उनकी गैरमौजूदगी खुद अपने आप में “राजनीतिक संदेश” दे रही है।

इस बीच, शरद पवार की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानी जाने वाली बेटी सुप्रिया सुले ने हाल ही में कई ऐसे फैसले लिए हैं जिन्होंने एमवीए के भीतर बहस को जन्म दिया है।

लोकसभा में ‘चुनाव सुधार’ पर हो रही बहस के दौरान जब कांग्रेस ने ईवीएम और वोट चोरी के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया, तब सुप्रिया सुले ने उससे अलग राय रखी। उन्होंने कहा- “मैं इसी मशीन (EVM) से चार बार जीती हूं, इसलिए मैं EVM या VVPAT पर सवाल नहीं उठाऊंगी।”

उनका ये बयान सीधा कांग्रेस की लाइन से विपरीत था, जिसने लगातार ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ये बयान सिर्फ तकनीकी मतभेद नहीं था, बल्कि इससे NCP(SP) के भीतर नई राजनीतिक सोच की झलक मिलती है… जो विपक्ष से अलग रास्ता अपनाने की तैयारी दर्शाती है।

ईवीएम पर कांग्रेस से अलग रुख अपनाने के अगले ही दिन सुप्रिया सुले ने अपनी पार्टी के सांसदों के साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। उन्होंने भले ही इस मुलाकात को महाराष्ट्र से जुड़े मुद्दों तक सीमित बताया हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसका अलग ही अर्थ निकाला जा रहा है।

सुप्रीया सुले ने अमित शाह के सामने बीड जिले के सरपंच संतोष देशमुख की हत्या का मुद्दा उठाया और परिवार को न्याय दिलाने की मांग की। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से गृह मंत्री को धन्यवाद दिया। ये कदम बताता है कि NCR(SP) अब केंद्र सरकार के साथ संवाद के नए रास्ते खोल रही है।

विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ के घटक के तौर पर NCR(SP) का ये बदलता रूख एमवीए के साझेदारों कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहा है।

गौरतलब है कि पिछले साल एनसीपी में विभाजन के बाद अजित पवार, जो शरद पवार के भतीजे हैं, पार्टी के बड़े हिस्से के साथ बीजेपी-शिंदे सरकार में शामिल हो गए थे। इससे चाचा-भतीजे के रिश्तों में गहरी दरार आ गई थी।

लेकिन हाल के महीनों में इन रिश्तों में नजदीकी बढ़ती दिख रही है। सूत्रों के अनुसार, दोनों के बीच कई बार मुलाकातें हो चुकी हैं। वहीं शरद पवार की ओर से भी अब अजित गुट के प्रति सॉफ्ट एप्रोच देखा जा रहा है।

ये भी दिलचस्प है कि सुप्रिया सुले और अजित पवार के बीच की पुरानी तल्खी अब कम होती दिख रही है। सुप्रिया कई बार सार्वजनिक मंचों पर अजित पवार के प्रशासनिक कामकाज की प्रशंसा करती देखी गई हैं। इसके अलावा, युवा नेता रोहित पवार भी हाल में अपने चाचा अजित के साथ कार्यक्रमों में नजर आए हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि ये बदलाव दर्शाता है कि पवार परिवार में चल रही “अंतर्कलह” अब धीरे-धीरे “तालमेल” का रूप ले रही है।

मुंबई महानगर पालिका (BMC) न केवल भारत की सबसे अमीर नागरिक निकाय है, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति का ‘पावर सेंटर’ भी मानी जाती है। इसीलिए बीएमसी चुनाव किसी भी पार्टी के लिए शक्ति परीक्षण से कम नहीं होते।

शिवसेना (यूबीटी), बीजेपी, शिंदे गुट, कांग्रेस और एनसीपी (दोनों खेमे) सभी दलों के लिए ये चुनाव साख का सवाल है। ऐसे में शरद पवार का चुनावी समय में मुंबई से दूरी बनाना और पार्टी लाइन पर अलग संकेत देना, न केवल एमवीए की एकता पर असर डाल सकता है, बल्कि बीजेपी के लिए भी एक रणनीतिक अवसर बन सकता है।

एनसीपी (एसपी) का भावी रुख अब दो संभावनाओं की ओर बढ़ता दिख रहा है… या तो पार्टी आगामी शहरी चुनावों में स्वतंत्र रूप से लड़ने का जोखिम लेगी। या फिर महाविकास अघाड़ी के साथ समझौते पर पुनर्विचार करेगी।