MNREGA name change controversy: मनरेगा नाम परिवर्तन विवाद पर सियासी संग्राम
मनरेगा का नाम बदलने को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर तीखा टकराव देखने को मिल रहा है. कांग्रेस लगातार मोदी सरकार पर हमलावर है और इसे महात्मा गांधी का अपमान करार दे रही है. वहीं सरकार की ओर से इसे समय के साथ बदलाव और प्रशासनिक सुधार से जोड़कर देखा जा रहा है. इस पूरे मुद्दे पर अब लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोला है.
सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में VB-G RAM-G बिल को लेकर हुई कैबिनेट बैठक में साफ कहा था कि नाम को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए. प्रधानमंत्री ने कहा था कि समय के अनुसार सब कुछ बदलता है. महात्मा गांधी और भगवान राम—दोनों ही भारतीय संस्कृति और समाज में पूजनीय हैं और दोनों की भावना का सम्मान किया जाता है. सरकार के अनुसार, इस बदलाव का उद्देश्य व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाना है, न कि किसी महापुरुष का अपमान करना.
हालांकि, कांग्रेस इस तर्क को सिरे से खारिज कर रही है. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक बयान के जरिए प्रधानमंत्री मोदी को निशाने पर लिया. राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री को महात्मा गांधी के विचारों से और गरीबों के अधिकारों से बड़ी दिक्कत है. उन्होंने आरोप लगाया कि मनरेगा हमेशा से मोदी सरकार की आंखों की किरकिरी रहा है और पिछले दस वर्षों से इसे कमजोर करने की कोशिश की जा रही है.
राहुल गांधी ने कहा कि मनरेगा महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज के सपने का जीवंत रूप है. यह योजना करोड़ों ग्रामीण गरीबों के लिए सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि जीवन रेखा है. उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के दौरान मनरेगा ग्रामीण भारत के लिए एक मजबूत आर्थिक सुरक्षा कवच साबित हुआ था, जब शहरों से लौटे प्रवासी मजदूरों को इसी योजना के तहत काम मिला.
कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी अब मनरेगा का नाम और स्वरूप बदलकर इसके मूल चरित्र को ही खत्म करना चाहते हैं. राहुल गांधी के मुताबिक, यह केवल नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि अधिकार आधारित योजना को केंद्र के नियंत्रण में लेने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि सरकार अब मनरेगा को ऐसी योजना में बदलना चाहती है, जहां सारी ताकत केंद्र के हाथों में सिमट जाए.
राहुल गांधी ने मनरेगा की बुनियाद में शामिल तीन मूल विचारों को गिनाया. उन्होंने कहा कि पहला सिद्धांत रोजगार का अधिकार था, जिसके तहत कोई भी ग्रामीण नागरिक अगर काम मांगेगा तो उसे काम मिलेगा. दूसरा सिद्धांत यह था कि गांव को यह तय करने की आज़ादी होगी कि उसके क्षेत्र में कौन से विकास कार्य किए जाएंगे. तीसरा और सबसे अहम सिद्धांत यह था कि मजदूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र देगा.
राहुल गांधी का आरोप है कि नए प्रस्तावित बदलावों में इन तीनों मूल विचारों को कमजोर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि अब बजट, योजनाएं और नियम केंद्र सरकार तय करेगी और राज्यों को 40 प्रतिशत खर्च उठाने के लिए मजबूर किया जाएगा. इससे राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा और गरीब राज्यों के लिए मनरेगा को प्रभावी ढंग से चलाना मुश्किल हो जाएगा.
उन्होंने आगे कहा कि नए प्रावधानों के तहत बजट खत्म होते ही या फसल कटाई के मौसम में दो महीने तक मजदूरों को काम नहीं मिलेगा. राहुल गांधी ने इसे ग्रामीण गरीबों के लिए विनाशकारी बताया. उन्होंने कहा कि यह बिल महात्मा गांधी के आदर्शों और उनके ग्राम-स्वराज के विचारों का सीधा अपमान है.
कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि मोदी सरकार पहले ही देश में भयंकर बेरोजगारी पैदा कर चुकी है, जिससे युवाओं का भविष्य अंधकार में चला गया है. अब यह नया बिल ग्रामीण गरीबों की सुरक्षित रोजी-रोटी को भी खत्म करने का जरिया बन सकता है. राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि कांग्रेस इस जनविरोधी बिल का विरोध गांव की गलियों से लेकर संसद तक करेगी.
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष है कि यह बदलाव प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही बढ़ाने के लिए जरूरी है. प्रधानमंत्री मोदी ने कैबिनेट बैठक में कहा था कि जवाबदेही सिर्फ केंद्र की ही नहीं, बल्कि राज्यों की भी होनी चाहिए. उन्होंने जोर दिया कि धन का विवेकपूर्ण उपयोग तभी संभव है, जब राज्यों की भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट हो.
सरकार का कहना है कि प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से पारदर्शिता सुनिश्चित की जाएगी. डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए खर्च, मजदूरी भुगतान और कार्यों की निगरानी की जाएगी, ताकि राज्य बनाम केंद्र को लेकर होने वाले आरोप-प्रत्यारोप पर रोक लग सके. सरकार यह भी मानती है कि बदलती परिस्थितियों के अनुसार योजनाओं में सुधार आवश्यक है, ताकि उनका लाभ सही लोगों तक पहुंचे.
मनरेगा के नाम और स्वरूप को लेकर छिड़ा यह विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है. जहां कांग्रेस इसे महात्मा गांधी और गरीबों के अधिकारों से जोड़कर देख रही है, वहीं सरकार इसे सुधार और जवाबदेही के कदम के रूप में पेश कर रही है. इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़कों तक सियासी घमासान तेज होने के संकेत मिल रहे हैं.

