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हरियाणा में एक तहसीलदार की नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। मामला रेवाड़ी ज़िले के डहीना तहसील का है, जहाँ बिहार के अफसर रिंकू यादव को नायब तहसीलदार के पद पर एक साल की डेपुटेशन पर तैनात किया गया है। रिंकू यादव मूल रूप से महेंद्रगढ़ के रहने वाले हैं, लेकिन फिलहाल वो बिहार सरकार की सेवा में भोजपुर जिले में सर्किल ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। अब उन्होंने डहीना में अपना कार्यभार संभाल भी लिया है। लेकिन इस पोस्टिंग को लेकर हरियाणा में सियासी तूफान खड़ा हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि राज्य सरकार हरियाणवी युवाओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है। कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने सवाल उठाया कि क्या हरियाणा के युवाओं में अफसर बनने की योग्यता नहीं बची है? हुड्डा का दावा है कि बीते 11 वर्षों में क्लास-1 और क्लास-2 की 75% सरकारी भर्तियाँ दूसरे राज्यों के लोगों को दी गई हैं। अब सरकार तहसील स्तर पर भी बाहर के अधिकारियों को डेपुटेशन पर बुला रही है। ऐसे में हरियाणा के युवाओं के लिए दरवाजे धीरे-धीरे बंद हो रहे हैं।

‘चपरासी हरियाणा का और नायब तहसीलदार बिहार का’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक राव दान सिंह ने भी तीखा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “चपरासी हरियाणा का और नायब तहसीलदार बिहार का!” उनका कहना है कि यदि राज्य में योग्य नायब तहसीलदार नहीं हैं तो नई भर्ती की जानी चाहिए थी, और अगर अफसर उपलब्ध हैं तो इस डेपुटेशन की जांच होनी चाहिए कि ये किसकी सिफारिश पर हुआ। पूर्व मंत्री कैप्टन अजय यादव ने भी इस मामले को लेकर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं दिखती। जब हरियाणा के हज़ारों नौजवान नौकरी के लिए इंतजार कर रहे हैं, तो बाहरी अफसरों को लाना स्थानीय युवाओं के साथ अन्याय है। सरकार को बताना चाहिए कि ये डेपुटेशन किस आधार पर हुआ और क्या इसके पीछे किसी नेता या रसूखदार की सिफारिश है?

सरकार ने मामले पर दी सफाई 

इस पूरे मामले में सरकार की तरफ से यही कहा जा रहा है कि डहीना में नायब तहसीलदार का पद पिछले 6 महीने से खाली था, और तत्काल जरूरत को देखते हुए डेपुटेशन को मंजूरी दी गई है। साथ ही यह भी दलील दी जा रही है कि रिंकू यादव हरियाणा के मूल निवासी हैं, बस नौकरी बिहार में कर रहे थे, ऐसे में यह नियुक्ति पूरी तरह नियमों के तहत है। डहीना का यह नायब तहसीलदार विवाद महज़ एक पोस्टिंग से ज़्यादा है। यह लोकल बनाम बाहरी की सूखी बहस नहीं, बल्कि नौकरी न्याय, पारदर्शिता और युवाओं के भरोसे का मसला है। अगर पद खाली था तो भर्ती प्रक्रिया तेज़ कर युवाओं को मौक़ा दिया जाना चाहिए था। अगर तत्काल अफ़सर चाहिए था तो नियम क़ायदों को सार्वजनिक किया जाए। सरकार को चाहिए कि स्पष्ट सूचना जारी करे—डेपुटेशन का आधार, अवधि, और भविष्य की भर्ती योजना क्या है। विपक्ष को भी आरोप प्रत्यारोप से आगे बढ़कर रचनात्मक सुझाव देने होंगे। क्योंकि मुद्दा सिर्फ एक कुर्सी का नहीं, हरियाणा के युवाओं की उम्मीदों का है।

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