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अखाड़े की सियासत और रिश्तों की ‘केमिस्ट्री’, ‘बृजभूषण-अखिलेश’ का ये रिश्ता क्या कहलाता है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति अपनी पेचीदगियों और अप्रत्याशित मोड़ों के लिए जानी जाती है। यहां गठबंधन बनते और बिगड़ते हैं, लेकिन कुछ रिश्ते पार्टी की सीमाओं और विचारधारा की बेड़ियों से मुक्त होकर एक अलग ही धरातल पर चलते हैं। वर्तमान में भाजपा के कद्दावर नेता और ‘बाहुबली’ छवि वाले बृजभूषण और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के बीच का समीकरण कुछ ऐसा ही है। ये रिश्ता राजनीतिक विश्लेषकों के लिए किसी रहस्यमयी पहेली जैसा है, जहां एक तरफ तीखी चुनावी प्रतिद्वंद्विता है, तो दूसरी तरफ गहरा निजी सम्मान।

बृजभूषण शरण सिंह और अखिलेश यादव के बीच इस ‘केमिस्ट्री’ की सबसे मजबूत बुनियाद ‘कुश्ती’ के अखाड़े में टिकी है। बृजभूषण दशकों तक भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष रहे हैं, वहीं अखिलेश यादव और उनके परिवार का कुश्ती से नाता जगजाहिर है। नेताजी मुलायम सिंह यादव खुद एक पहलवान थे और उन्होंने अखिलेश को भी इसी अखाड़ा संस्कृति के संस्कारों में ढाला है।

कुश्ती का खेल सिखाता है कि भले ही मैदान में प्रतिद्वंद्वी को पटखनी देनी हो, लेकिन अखाड़े के बाहर गुरु और पहलवान का सम्मान सर्वोपरि है। ये ही कारण है कि जब राजनीति के मैदान में दोनों आमने-सामने होते हैं, तब भी मर्यादा की एक महीन रेखा कभी नहीं लांघी जाती, बृजभूषण अक्सर कहते हैं कि अखिलेश यादव उस ‘पहलवानी संस्कार’ को समझते हैं, जो आज की राजनीति में दुर्लभ होता जा रहा है।

हाल के वर्षों में जब महिला पहलवानों के आरोपों के बाद बृजभूषण शरण सिंह के चारों ओर सियासी बवंडर उठा, तब पूरी विपक्ष ने उन्हें घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक, सभी ने उन्हें भाजपा के ‘कमजोर बिंदु’ के रूप में देखा। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच अखिलेश यादव की चुप्पी ने सबको हैरान कर दिया।

बृजभूषण शरण सिंह ने खुद कई मंचों पर इस बात को स्वीकार किया और अखिलेश की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि, जहां अन्य दलों ने इस मुद्दे को व्यक्तिगत हमले का जरिया बनाया, वहीं अखिलेश यादव ने एक ‘स्वस्थ राजनीतिक परंपरा’ का परिचय दिया। बृजभूषण के मुताबिक, अखिलेश ने इस पूरे विवाद को कभी अपनी राजनीति की सीढ़ी नहीं बनाया, जिसे वे एक पारिवारिक और सम्मानजनक व्यवहार के रूप में देखते हैं। ये चुप्पी दरअसल उस पुराने एहसान और दोस्ती का प्रतीक थी, जो दशकों से चली आ रही है।
इस रिश्ते की जड़ें 2009 के लोकसभा चुनावों में मिलती हैं।

वो एक ऐसा दौर था जब बृजभूषण शरण सिंह को एक राजनीतिक सहारे की सख्त जरूरत थी उस समय मुलायम सिंह यादव ने पार्टी की सीमाओं को दरकिनार कर उन्हें समाजवादी पार्टी का टिकट दिया। बृजभूषण न केवल सपा के टिकट पर सांसद चुने गए, बल्कि उन्होंने पार्टी के संकट के समय मुलायम सिंह का साथ भी निभाया। मुलायम सिंह के प्रति उनका वो आदर अब अखिलेश यादव के प्रति प्रेम और प्रशंसा में बदल चुका है। बृजभूषण आज भी खुद को ‘मुलायमवादी’ संस्कारों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं, भले ही उनका वर्तमान पता ‘कमल’ का फूल हो।

हाल ही में जब बहराइच की भाजपा विधायक अनुपमा जायसवाल पुतला दहन के दौरान झुलस गईं और अखिलेश यादव उनसे मिलने मेदांता अस्पताल पहुंचे, तो बृजभूषण सिंह ने खुलकर इसकी सराहना की। उन्होंने इसे उत्तर प्रदेश की ‘गंगा-जमुनी’ राजनीतिक तहजीब बताया। उन्होंने कहा कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद मानवीय संवेदनाएं जीवित रहनी चाहिए।

राजनीति में कोई भी शब्द या कदम बिना किसी उद्देश्य के नहीं होता। 2027 के विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा के भीतर रहते हुए भी विपक्षी दल के नेता की इतनी मुखर प्रशंसा करना सिर्फ ‘शिष्टाचार’ नहीं हो सकता। ये उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी नए समीकरण की आहट भी हो सकती है।

बृजभूषण और अखिलेश का ये रिश्ता साबित करता है कि राजनीति केवल आंकड़ों और रैलियों का खेल नहीं है, बल्कि ये व्यक्तिगत निष्ठाओं का भी संगम है। जहां एक ओर दलगत राजनीति लोगों को बांटती है, वहीं पुरानी दोस्ती और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का यह ‘ब्रिज’ रिश्तों की गर्माहट को बनाए रखता है।

क्या ये प्रशंसा केवल एक पुराने साथी के प्रति सम्मान है, या फिर भविष्य में सत्ता के गलियारों में किसी नई खिचड़ी के पकने का संकेत? ये तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल, बृजभूषण और अखिलेश की ये केमिस्ट्री यूपी की सियासत में ये संदेश दे रही है कि राजनीति में ‘दुश्मनी’ की भी एक गरिमा होती है, और ‘दोस्ती’ की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

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