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अचानक महिला आरक्षण कानून लागू करने की क्या है कहानी ? क्या उल्टा पड़ गया ‘रूल 66’ वाला दांव ?

संसद में इन दिनों महिला आरक्षण को लेकर माहौल काफी गरम है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ फिर से चर्चा में है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीति और रणनीति दोनों काम कर रही हैं। शुक्रवार को लोकसभा में इस मुद्दे पर वोटिंग होनी है, जिससे पहले सरकार ने एक अहम कदम उठाया है।

दरअसल, केंद्र सरकार ने 2023 में पास हुए महिला आरक्षण कानून को अब आधिकारिक तौर पर लागू कर दिया है। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने की बात कही गई है। पहले यह तय था कि यह व्यवस्था जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होगी, लेकिन अब इसे लेकर नई बहस छिड़ गई है।

सरल भाषा में समझें तो, कोई भी कानून पास होने के बाद तब तक पूरी तरह लागू नहीं माना जाता, जब तक सरकार उसे नोटिफाई (अधिसूचित) न करे। अब सरकार ने इसे नोटिफाई कर दिया है, यानी यह कानून अब कागज से निकलकर लागू स्थिति में आ गया है।

इस कदम के पीछे एक कानूनी वजह भी बताई जा रही है। अगर सरकार इस कानून में बदलाव करना चाहती है, तो पहले उसे लागू करना जरूरी होता है। इसलिए पहले पुराने कानून को लागू किया गया, ताकि उसमें आगे बदलाव किया जा सके।

लेकिन इसके साथ राजनीति भी जुड़ी हुई है। संसद में जो नया संशोधन बिल लाया गया है, उसे पास कराने के लिए बड़ी संख्या में वोट चाहिए। मौजूदा स्थिति में सरकार के लिए यह आसान नहीं दिख रहा। ऐसे में अगर नया बिल पास नहीं होता, तो भी पहले से लागू कानून एक बैकअप के रूप में मौजूद रहेगा।

सरकार ने इस बार एक और खास रणनीति अपनाई है। महिला आरक्षण, परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े प्रस्तावों को एक साथ जोड़ दिया गया है। यानी सांसदों को पूरे पैकेज पर एक साथ फैसला लेना होगा—या तो सबका समर्थन करें या पूरी तरह विरोध करें।

इससे विपक्ष के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है, क्योंकि अगर वह किसी एक बात से सहमत है, तो बाकी चीजों को भी मानना पड़ेगा। वहीं सरकार इस तरीके से ज्यादा समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है।

कुल मिलाकर, महिला आरक्षण को लेकर संसद में सिर्फ कानून नहीं, बल्कि राजनीति, रणनीति और गणित—तीनों का खेल एक साथ चल रहा है। आने वाली वोटिंग से साफ हो जाएगा कि यह दांव सरकार के पक्ष में जाता है या नहीं।

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