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उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल तेज, NDA घटक दलों ने बनाई साझा रणनीति!, भाजपा पर दबाव बनाने की है तैयारी !

उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल तेज

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के दौरान प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी गतिविधियां तेज़ होती जा रही हैं। प्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दल न केवल संगठनात्मक स्तर पर खुद को मजबूत करने में जुटे हैं, बल्कि चुनावी समीकरणों को साधने के लिए गठबंधनों के भीतर भी नई रणनीतियां बनाना शुरू कर चुके हैं। इसी क्रम में हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुए एक आयोजन ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।

ये आयोजन हालांकि निषाद पार्टी के 10वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में किया गया था, लेकिन इसमें शामिल हुए अन्य एनडीए घटक दलों, सुभासपा (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी), अपना दल (एस) और राष्ट्रीय लोकदल (RLD), की मौजूदगी ने इस कार्यक्रम को महज औपचारिकता से कहीं अधिक रणनीतिक बना दिया। यूपी आधारित इन क्षेत्रीय दलों का एक साथ दिल्ली में मंच साझा करना एक स्पष्ट संदेश था, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को कि, ये सहयोगी दल अब केवल “छोटे भाई” की भूमिका में नहीं रहना चाहते, बल्कि अपनी सियासी हैसियत को लेकर गंभीर हैं।

इन दलों के नेताओं ने जहां एक ओर अपने भाषणों में समाजवादी पार्टी और उसकी ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) रणनीति पर तीखा हमला बोला, वहीं दूसरी ओर उनके तेवरों में एक सधी हुई चेतावनी भी थी…जो भाजपा के लिए एक प्रकार का संकेत था। खासतौर पर सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर और अपना दल एस के नेता आशीष पटेल ने अपने संबोधनों में ये तो स्पष्ट कर दिया कि वे एनडीए के साथ हैं, लेकिन साथ ही ये भी जता दिया कि, आने वाले समय में सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीतियों में उनकी भागीदारी और सम्मानजनक हिस्सेदारी जरूरी है।

गौरतलब है कि, सुभासपा और निषाद पार्टी पहले भी बिहार चुनाव में एनडीए से सीटों की मांग कर चुके हैं और अब ये दोनों ही दल बिहार विधानसभा चुनाव में भाग लेने की मंशा जता चुके हैं। संजय निषाद और ओम प्रकाश राजभर दोनों ही बिहार में अपनी सियासी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं। हालांकि, अपना दल एस की तरफ से अभी तक इस संबंध में कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जिस तरह से ये तीनों दल दिल्ली के मंच पर साथ नजर आए, उससे ये साफ है कि एक साझा रणनीति पर काम किया जा रहा है।

ये रणनीति सिर्फ बिहार चुनाव तक सीमित नहीं है। यूपी में 2026 में प्रस्तावित पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ये छोटे-छोटे लेकिन असरदार क्षेत्रीय दल भाजपा पर दबाव बनाकर अपने लिए अधिक सीटों की मांग कर सकते हैं। दरअसल, एनडीए के भीतर ये हमेशा से एक चुनौती रही है कि सहयोगी दलों को कितनी हिस्सेदारी दी जाए। यूपी जैसे बड़े राज्य में जहां जातीय समीकरण चुनावी सफलता का सबसे बड़ा आधार होते हैं, वहां निषाद, कुर्मी, राजभर जैसे वोट बैंक रखने वाले दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

दिल्ली में कार्यक्रम आयोजित करने का एक कारण ये भी माना जा रहा है कि ये आयोजन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को सीधे तौर पर संदेश देने के लिए था। लखनऊ में कार्यक्रम आयोजित करने की बजाय दिल्ली को चुना गया, ताकि राजनीतिक दबाव ज्यादा प्रभावशाली तरीके से डाला जा सके। भाजपा आलाकमान को ये दिखाया जा सके कि एनडीए के सहयोगी दल अब संगठित होकर रणनीति बना रहे हैं और उन्हें नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा।

एनडीए के भीतर ये नया गठजोड़ भविष्य में भाजपा के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर सकता है। एक तरफ विपक्षी दलों से मुकाबला, तो दूसरी ओर सहयोगियों की बढ़ती अपेक्षाएं। ये सहयोगी दल भाजपा को ये जताना चाहते हैं कि वे सिर्फ चुनावी समर्थन के लिए नहीं हैं, बल्कि सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में भी समान भागीदारी के हकदार हैं।

यूपी की राजनीति में इन दलों की अहमियत कम नहीं है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को इन सहयोगियों के साथ गठजोड़ का लाभ मिला था। लेकिन तब की परिस्थितियां और आज के राजनीतिक समीकरणों में अंतर है। अब ये दल खुद को अधिक मजबूत मानते हैं और सीटों को लेकर समझौते के मूड में नहीं दिखते।

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