राजस्थान में फिर खुलेगी तबादलों की खिड़की !

राजस्थान के सरकारी गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है। “क्या तबादलों से बैन हटने वाला है?” चाय की थड़ियों से लेकर सचिवालय के कमरों तक, प्रदेश के करीब 8 लाख अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि सरकार के एक फैसले के इंतजार में बैठे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने संकेत दिए थे कि 10 जून के बाद तबादलों पर कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है। इस बयान के बाद से ही प्रशासनिक महकमों में हलचल तेज हो गई है।

कर्मचारियों को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही तबादलों से प्रतिबंध हटाएगी। लेकिन इस बार कहानी में थोड़ा ट्विस्ट है… कर्मचारी संगठन इस बात पर अड़े हैं कि तबादले इसी समय (यानी गर्मी की छुट्टियों में) खोले जाएं। आइए इस पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर राजस्थान में तबादलों का ये गणित क्या है, कर्मचारी क्यों परेशान हैं और सरकार के सामने क्या चुनौतियां हैं।

राजस्थान में जब भी सत्ता बदलती है या कोई नई सरकार आती है, तो प्रशासनिक फेरबदल और कर्मचारियों के तबादले एक सामान्य प्रक्रिया बन जाते हैं। भजनलाल सरकार के गठन के बाद से अब तक दो बार सामान्य तबादले खोले जा चुके हैं, और एक बार विशेष छूट दी गई है। अब चर्चा है कि तीसरी बार तबादलों की खिड़की खुलने जा रही है। मुख्यमंत्री के संकेत के बाद कर्मचारी वर्ग सक्रिय हो गया है। सरकारी विभागों में सूचियां बनने और सिफारिशों का दौर पर्दे के पीछे शुरू हो चुका है। जनप्रतिनिधि यानी के (विधायक और स्थानीय नेता) भी अपने क्षेत्रों में मनपसंद अधिकारियों और कर्मचारियों को लाने के लिए एक्टिव मोड में हैं। इस बार कर्मचारी संगठनों की मांग बहुत व्यावहारिक और सीधे तौर पर उनके परिवारों से जुड़ी है। उनका कहना है कि, अगर सरकार को तबादले करने ही हैं, तो इसी गर्मी की छुट्टियों के दौरान ये प्रक्रिया पूरी कर ली जाए।

इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं…. पहली बच्चों की पढ़ाई का नुकसान…. क्योंकि, जब Academic Session के बीच में किसी कर्मचारी का तबादला होता है, तो सबसे ज्यादा गाज उसके बच्चों की पढ़ाई पर गिरती है। बीच साल में नए स्कूल में एडमिशन मिलना मुश्किल होता है, और अगर मिल भी जाए, तो बच्चे का सिलेबस पीछे छूट जाता है। दूसरी पारिवारिक और व्यावहारिक परेशानियां… अचानक ट्रांसफर होने से कर्मचारियों को नया मकान ढूंढने, सामान शिफ्ट करने और नए माहौल में ढलने में भारी परेशानी होती है। अगर यही काम मई-जून की छुट्टियों में हो जाए, तो परिवार आराम से नए स्थान पर सेटल हो जाता है और जुलाई से बच्चे नए स्कूल में अपनी पढ़ाई शुरू कर सकते हैं। वहीं, पिछले सरकारें (चाहे कांग्रेस की रही हों या बीजेपी की) आमतौर पर कर्मचारियों की इसी मानवीय सुविधा को देखते हुए गर्मी की छुट्टियों में तबादले खोलती आई हैं।

लेकिन इस बार भजनलाल सरकार के कार्यकाल में अब तक जो हुआ, उसने कर्मचारियों की चिंता बढ़ा दी थी। चर्चाओं के बीच ये जानना जरूरी है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में अब तक तबादलों की स्थिति क्या रही है। सरकार बनने के बाद से अब तक तीन बार इस तरह के मौके आए हैं: 10 से 22 फरवरी 2024 सरकार बनने के तुरंत बाद सभी विभागों, निगमों और बोर्डों में तबादलों की खुली अनुमति दी गई थी। 1 से 15 जनवरी 2025 नए साल की शुरुआत में अधिकांश विभागों में तबादले खोले गए, लेकिन शिक्षा विभाग जैसे बड़े महकमों में प्रतिबंध जारी रहा। 8 मई से 30 जून 2025 Border और दूर-दराज के जिलों में खाली पदों को भरने के लिए विशेष छूट के तहत तबादले किए गए थे। कर्मचारी संगठनों का दर्द ये है कि फरवरी 2024 और जनवरी 2025 ऐसे समय पर आए जब स्कूलों और कॉलेजों का सत्र बीच में था… जनवरी-फरवरी में बच्चों की परीक्षाएं नजदीक होती हैं। ऐसे में जो कर्मचारी ट्रांसफर चाहते भी थे, वे पारिवारिक मजबूरियों के कारण असमंजस में फंस गए। इसीलिए इस बार ‘तीसरी खिड़की’ को लेकर मांग तेज है कि फैसला तुरंत हो।

राजस्थान में जब भी तबादलों की बात होती है, तो सबसे बड़ा महकमा होता है शिक्षा विभाग। इसमें भी सबसे ज्यादा संख्या ‘थर्ड ग्रेड’ शिक्षकों की है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने हाल ही में तबादलों को लेकर जो बयान दिया, उसने कुछ विभागों को राहत दी तो कुछ को सस्पेंस में डाल दिया। शिक्षा मंत्री ने साफ किया कि बड़ी संख्या में Lecturers और Principals के तबादले पहले ही किए जा चुके हैं। इसलिए फिलहाल उनके लिए दोबारा खिड़की खोलने की कोई बड़ी जरूरत नहीं दिखती। इनके लिए मंत्री जी ने कहा कि सरकार सही समय आने पर उचित निर्णय लेगी। थर्ड ग्रेड शिक्षक: ये राजस्थान का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। सालों से ये शिक्षक अपने Home Districts में ही ट्रांसफर की मांग कर रहे हैं। इस पर शिक्षा मंत्री ने गेंद मुख्यमंत्री के पाले में डालते हुए कहा कि “थर्ड ग्रेड शिक्षकों के तबादलों पर अंतिम फैसला केवल और केवल मुख्यमंत्री स्तर पर ही लिया जाएगा।” अगर मुख्यमंत्री निर्देश देंगे, तो विभाग उसकी पालना करेगा।

तबादले सिर्फ कर्मचारियों की जरूरत नहीं होते, बल्कि ये राजनीतिक और प्रशासनिक तालमेल का भी हिस्सा होते हैं। विधायकों और स्थानीय नेताओं को अपने क्षेत्र में विकास कार्य करवाने और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी पसंद के अधिकारियों (जैसे एसडीएम, तहसीलदार, बीडीओ या पुलिस अधिकारी) की जरूरत होती है। चुनाव के बाद या सरकार के पैर जमने के बाद नेता चाहते हैं कि उनके क्षेत्र की प्रशासनिक मशीनरी उनके अनुसार काम करे। कई अधिकारी जो लंबे समय से लूप लाइन (कम महत्व वाले पदों) में हैं, वे मुख्यधारा में आने के लिए प्रयासरत हैं। वहीं, फील्ड में तैनात अधिकारी अपनी पसंद के जिलों या सचिवालय में पोस्टिंग चाहते हैं।

फिलहाल गेंद पूरी तरह से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के पाले में है। अगर आगामी दिनों में तबादलों से बैन हटता है, तो सरकारी विभागों में अर्जियों की बाढ़ आना तय है। कर्मचारियों की बस एक ही उम्मीद है कि सरकार इस बार “राजनीतिक नफा-नुकसान” से ऊपर उठकर “मानवीय दृष्टिकोण” अपनाए। अगर जून के इसी पखवाड़े में आदेश जारी हो जाते हैं, तो ये प्रदेश के लाखों परिवारों के लिए एक बड़ी राहत होगी… अब देखना ये है कि, मुख्यमंत्री कार्यालय से हरी झंडी कब मिलती है और इस बार तबादलों की नीति कितनी पारदर्शी रहती है।

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