अल-फलाह यूनिवर्सिटी से आतंकी साजिश का पर्दाफाश
दिल्ली धमाके की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं। अब NIA की जांच में ये सामने आया है कि, डॉ. मुज्जमिल की गिरफ्तारी के तुरंत बाद आतंकी मॉड्यूल से जुड़े अन्य सदस्यों ने सबूत मिटाने की कोशिश शुरू कर दी थी। इसी कड़ी में डॉ. उमर और बिलाल द्वारा एक टैबलेट को तोड़ने का मामला सामने आया है।
एनआईए ने फरीदाबाद स्थित अल-फलाह यूनिवर्सिटी परिसर में कार्रवाई करते हुए डॉ. उमर के कमरे से टूटे हुए टैबलेट के कई हिस्से बरामद किए हैं। जांच एजेंसी का मानना है कि, इस टैब में आतंकी गतिविधियों से जुड़ी बेहद संवेदनशील जानकारियां मौजूद थीं, जिन्हें जानबूझकर नष्ट किया गया।
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, जैसे ही डॉ. मुज्जमिल को गिरफ्तार किया गया, पूरे मॉड्यूल में अफरा-तफरी मच गई। जांच एजेंसियों को आशंका है कि, इसी घबराहट में डॉ. उमर और बिलाल ने टैबलेट को तोड़कर सबूत खत्म करने की कोशिश की।

बताया जा रहा है कि, इस टैबलेट में जसीर बिलाल वानी उर्फ दानिश द्वारा तैयार किए गए मोडिफाइड ड्रोन और रॉकेट के स्केच मौजूद थे। इसके अलावा, आतंकी नेटवर्क से जुड़े संपर्क, चैट्स और तकनीकी जानकारियां भी इसी डिवाइस में सेव थीं।
एनआईए की टीम 23 दिसंबर की शाम को दिल्ली बम धमाके के आरोपी जसीर बिलाल वानी को लेकर अल-फलाह यूनिवर्सिटी पहुंची थी। यहां करीब दो घंटे तक यूनिवर्सिटी के अलग-अलग हिस्सों में आरोपी की निशानदेही कराई गई। इसी दौरान डॉ. उमर के कमरे की तलाशी में टूटे टैबलेट के पार्ट्स मिले, जिसने जांच को नई दिशा दे दी।
जसीर बिलाल वानी यूनिवर्सिटी में पीडियाट्रिक्स विभाग में जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर के तौर पर काम कर रहा था। शुरुआती जांच में ये सामने आया है कि, जसीर ने ही डॉ. उमर को आतंकी हमलों के लिए तकनीकी सहायता मुहैया कराई थी। दिल्ली धमाके से पहले वह ड्रोन और रॉकेट को मोडिफाई करने के प्रयोग भी कर चुका था।
जांच एजेंसियों के अनुसार, ये व्हाइट कॉलर आतंकी मॉड्यूल कोई नया नहीं था। साल 2019 से ही उच्च शिक्षित डॉक्टरों को कट्टरपंथ की ओर धकेलने की प्रक्रिया चल रही थी। सीमा पार बैठे आतंकी आका सोशल मीडिया के जरिए इन्हें अपने जाल में फंसा रहे थे।
सूत्रों का कहना है कि, पाकिस्तान और अन्य देशों में बैठे हैंडलर पढ़े-लिखे प्रोफेशनल्स को खास तौर पर टारगेट कर रहे थे, ताकि शक की गुंजाइश कम रहे और नेटवर्क लंबे समय तक छुपा रहे।
जांच में सामने आया है कि, डॉ. मुज्जमिल गनई, डॉ. अदील राथर, डॉ. मुजफ्फर राथर और डॉ. उमर नबी से शुरुआती संपर्क फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर किया गया था। बाद में इन्हें टेलीग्राम के प्राइवेट ग्रुप्स में जोड़ा गया, जहां धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा थोपी गई।
इस मॉड्यूल के मुख्य हैंडलर उकासा, फैजान और हाशमी बताए जा रहे हैं, जो विदेश से पूरे नेटवर्क को संचालित कर रहे थे।
शुरुआत में इन डॉक्टरों ने सीरिया और अफगानिस्तान जैसे संघर्ष क्षेत्रों में जाने की इच्छा जताई थी। लेकिन बाद में हैंडलरों ने इन्हें भारत में ही रहकर हमले करने का निर्देश दिया। यही वो मोड़ था, जहां से दिल्ली धमाके जैसी बड़ी साजिश ने आकार लिया।
जांच एजेंसियों ने ये भी खुलासा किया है कि, आतंकी संगठन अब भर्ती के लिए AI तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। संभावित भर्तियों को AI से बने वीडियो दिखाकर भावनात्मक और वैचारिक रूप से बरगलाया जाता है। ये रणनीति 2018 के बाद तेजी से अपनाई गई।
10 नवंबर 2025 को शाम 6:52 बजे दिल्ली के लाल किले के पास एक कार बम धमाका हुआ था। इस हमले में 15 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें हमलावर भी शामिल था, जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कई गाड़ियां आग की चपेट में आ गई थीं। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच एनआईए को सौंपी गई, और अब एक-एक परत खुलती जा रही है।

