देश

politics of bengal: बंगाल की राजनीति में नई हलचल, निलंबित TMC विधायक हुमायूं कबीर ने खुद को ‘बंगाल का ओवैसी’ बताया, नई पार्टी से ममता के वोट बैंक को चुनौती का ऐलान

politics of bengal: बंगाल की राजनीति में नई हलचल

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन राज्य की राजनीति अचानक से नए मोड़ पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर लगातार सुर्खियाँ बटोर रहे हैं और अब उन्होंने ऐसा ऐलान कर दिया है जिसने बंगाल की सियासत में हलचल बढ़ा दी है। कबीर न केवल TMC के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल रहे हैं बल्कि उनका दावा है कि वे AIMIM की तर्ज पर बंगाल में नई पार्टी बनाकर मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाएंगे। यही नहीं, उन्होंने खुद को ‘बंगाल का ओवैसी’ तक कह दिया है।

हुमायूं कबीर का कहना है कि उन्होंने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से बात की है और ओवैसी ने उन्हें “जुबान” दी है कि वे हैदराबाद के ओवैसी हैं और कबीर बंगाल के। कबीर ने मीडिया से कहा कि वह 10 दिसंबर को कोलकाता पहुंचकर अपनी नई पार्टी की संगठनात्मक कमेटी बनाएंगे और 22 दिसंबर को लाखों समर्थकों के साथ इस पार्टी का औपचारिक लॉन्च करेंगे। उनके इस बयान ने ममता बनर्जी की रणनीति पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है क्योंकि बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक अब तक TMC का मजबूत आधार माना जाता रहा है

हुमायूं कबीर पिछले एक महीने से सुर्खियों में लगातार बने हुए हैं। बाबरी मस्जिद के विषय पर विवादित बयान देने के बाद टीएमसी ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया। इसके बाद से ही कबीर लगातार तृणमूल के खिलाफ बयानबाज़ी कर रहे हैं और खुद को आने वाले चुनाव में “किंगमेकर” तक बता रहे हैं। उनका दावा है कि वे आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव में 135 सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे—ये वे सीटें हैं जहाँ मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा, “मैं गेम-चेंजर बनने जा रहा हूँ। तृणमूल का मुस्लिम वोट बैंक खत्म हो जाएगा।”

बंगाल में कुल मुस्लिम आबादी लगभग 27 से 28 प्रतिशत मानी जाती है और पिछले कई चुनावों से यह वोट बैंक बड़े पैमाने पर TMC के समर्थन में रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि हुमायूं कबीर इस वोट बैंक में 5 से 7 प्रतिशत भी सेंध लगा लेते हैं, तो यह ममता बनर्जी के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है क्योंकि चुनावी समीकरणों में यह प्रतिशत कई सीटों के परिणाम को बदलने की क्षमता रखता है।

हालाँकि AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पहले ही इस बात का खंडन कर चुके हैं कि उनकी पार्टी का हुमायूं कबीर के साथ किसी तरह का गठबंधन हो रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ओवैसी आम तौर पर अपने चुनावी फैसले के लिए हैदराबाद से ही रणनीति तय करते हैं और उन्हें किसी राज्य में नेतृत्व साझा या सौंपने जैसी बातों में रुचि कम होती है। इसके बावजूद कबीर AIMIM की शैली में खुद को पेश कर रहे हैं और मुस्लिम समुदाय के भीतर अपने लिए एक अलग पहचान बनाने की कोशिश में लगे हैं।

टीएमसी के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि पार्टी लगातार दावा करती रही है कि बंगाल की अल्पसंख्यक आबादी उसके साथ मजबूती से खड़ी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार कहा है कि उनकी सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सबसे अधिक योजनाएँ लागू की हैं और उन्हें सामाजिक-आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है। लेकिन हुमायूं कबीर की नई राजनैतिक पहल इस दावे के सामने एक नई चुनौती प्रस्तुत करती है। खासकर उन इलाकों में जहाँ मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है—मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर व दक्षिण 24 परगना, हावड़ा और कुछ हिस्सों में—कबीर की एंट्री स्थानीय समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि किसी नए नेता के लिए सिर्फ नाराजगी के आधार पर स्थायी वोट बैंक खड़ा करना आसान नहीं होता। कई सामाजिक संगठनों और मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि बंगाल में मुस्लिम समाज आमतौर पर रणनीतिक मतदान करता है और बिना ठोस आधार वाले नए विकल्पों को जल्द स्वीकार नहीं करता। हालांकि कबीर का दावा है कि “लाखों” समर्थक उनके साथ हैं, लेकिन राजनीतिक ज़मीन पर यह समर्थन कितना ठोस है, यह आने वाले कुछ महीनों में ही स्पष्ट हो पाएगा।

कबीर का नाम TMC की राजनीति में हमेशा विवादों से जुड़ा रहा है। वे पहले कांग्रेस में थे, फिर तृणमूल में आए, और अब नई पार्टी का ऐलान कर रहे हैं। इस राजनीतिक यात्रावृत्त के कारण कई लोग उन्हें भरोसेमंद विकल्प नहीं मानते। फिर भी, उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि आने वाले चुनावों में वे किसी न किसी रूप में माहौल को प्रभावित करने का प्रयास करेंगे।

बंगाल की राजनीति वैसे भी बहुपक्षीय और जटिल है। भाजपा, तृणमूल, कांग्रेस, वाम मोर्चा के बीच पहले ही त्रिकोणीय व चतुष्कोणीय मुकाबले होते रहे हैं। अब हुमायूं कबीर की नई पार्टी के चुनावी मैदान में उतरने से मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। चाहे वे सीटें जीतें या न जीतें, लेकिन वोटों का बिखराव कई संवेदनशील सीटों पर समीकरण बदल सकता है।

बंगाल में मुस्लिम राजनीति का इतिहास बताता है कि नए नेताओं को स्थान बनाने में समय लगता है। हुमायूं कबीर अपने आप को ‘बंगाल का ओवैसी’ बताकर राजनीतिक पहचान गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी वास्तविक ताकत चुनावी मैदान में ही परखी जाएगी। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कबीर का दावा कितना असर डालता है और क्या वे वास्तव में TMC के वोट बैंक को चुनौती दे पाते हैं या नहीं।

admin

Recent Posts

NEET मुद्दे पर विपक्ष में मतभेद! अखिलेश यादव और केसी वेणुगोपाल के बीच तीखी बहस

NEET परीक्षा और छात्रों के आंदोलन को लेकर संसद में चल रहे विरोध के बीच…

2 days ago

‘मैं संत नहीं हूं’, राधे मां ने तोड़ी चुप्पी, पैसों के आरोप और विवादों पर दिया जवाब

आध्यात्मिक गुरु के रूप में चर्चित राधे मां ने लंबे समय बाद अपने जीवन, विवादों…

2 days ago

लोकसभा से TMC सांसद कल्याण बनर्जी निलंबित, जानिए क्या बनी वजह ?

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद कल्याण बनर्जी को लोकसभा के मौजूदा मॉनसून सत्र की शेष…

2 days ago

अनंतनाग में पुलिस जवान पर आतंकी हमला, हेड कांस्टेबल आशिक हुसैन कुरैशी शहीद

जम्मू-कश्मीर के दक्षिण कश्मीर स्थित अनंतनाग जिले में आतंकियों ने पुलिस बल को निशाना बनाया।…

2 days ago

CJP ने सरकार से बातचीत पर रखीं शर्तें, कहा- जंतर-मंतर या सार्वजनिक जगह पर ही होगी अगली बैठक

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने केंद्र सरकार के साथ बातचीत को लेकर अपना रुख स्पष्ट…

2 days ago

शेयर बाजार में लगातार गिरावट, लेकिन सोना-चांदी की कीमतों में जबरदस्त उछाल

सप्ताह की शुरुआत से ही भारतीय शेयर बाजार दबाव में बना हुआ है। बुधवार को…

2 days ago