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Political tussle erupts in West Bengal ahead of elections: प.बंगाल में चुनाव से पहले सियासी खींचतान, मनरेगा को लेकर केंद्र और राज्य में टकराव, CM ममता बनर्जी ने फाड़ा केंद्र का आदेश

Political tussle erupts in West Bengal ahead of elections: प.बंगाल में चुनाव से पहले सियासी खींचतान

पश्चिम बंगाल में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल लगातार तनावपूर्ण होता जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच का नवीनतम विवाद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) को लेकर है। करीब तीन साल बाद केंद्र ने कुछ नई शर्तों के साथ मनरेगा को “तत्काल प्रभाव से” राज्य में दोबारा लागू करने का आदेश जारी किया है, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस कदम का तीखा विरोध करते हुए इसे “अपमानजनक” और “बेकार” करार दिया है।

केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 6 दिसंबर को कलकत्ता हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि “पश्चिम बंगाल में महात्मा गांधी नरेगा को तुरंत प्रभाव से फिर से लागू किया जा रहा है।” मंत्रालय ने यह सूचना राज्य सरकार को भी भेजी। वर्ष 2022 में केंद्र ने योजना के क्रियान्वयन में कथित अनियमितताओं का हवाला देते हुए धारा 27 के तहत बंगाल को फंड जारी करना रोक दिया था, जिसके चलते लगभग 3.5 वर्षों से हजारों मजदूर भुगतान के इंतजार में थे।

नई शर्तों में राज्य को सभी मजदूरों का 100% ई-केवाईसी पूरा करना अनिवार्य किया गया है। मस्टर रोल तभी जारी होंगे जब मजदूरों की ई-केवाईसी पूरी हो जाएगी। इसके अलावा, केंद्र ने लेबर बजट की मंजूरी तिमाही आधार पर करने का निर्णय लिया है—जो पहले पूरे वर्ष के लिए जारी किया जाता था। अब परफॉर्मेंस, शर्तों के पालन और कार्य की प्रगति को तिमाही आधार पर मूल्यांकित किया जाएगा। साथ ही 20 लाख रुपये से अधिक लागत वाले कार्यों को मंजूरी नहीं दी जाएगी, और सभी सामुदायिक परियोजनाओं के लिए DPR बनाना और SECURE Soft के माध्यम से अपलोड करना अनिवार्य होगा।

लेकिन ममता बनर्जी इन शर्तों को लेकर बेहद नाराज हैं। मंगलवार को कूचबिहार में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने केंद्र के आदेश की प्रति मंच से ही फाड़ दी। ममता ने कहा, “यह कागज का टुकड़ा बेकार और अपमानजनक है। बंगाल कभी दिल्ली की खैरात पर नहीं चला है। हम अपनी वर्क स्कीम चलाएंगे। आपके नियम स्वीकार नहीं।”

उन्होंने कहा कि केंद्र अब 6 दिसंबर से तिमाही लेबर बजट जमा करने की शर्त लगा रहा है, जबकि दिसंबर का महीना आधा बीत चुका है और राज्य चुनाव की तैयारी में व्यस्त है। ममता ने सवाल उठाया, “कब ट्रेनिंग देंगे, कब काम देंगे? यह केवल कागजी कार्रवाई बढ़ाने और राज्य को परेशान करने की साजिश है।” उन्होंने यह भी घोषणा की कि राज्य सरकार अपनी कर्मश्री योजना के तहत पहले से 70 दिन का काम दे रही है, जिसे अब बढ़ाकर 100 दिन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने मंच से केंद्र पर निशाना साधते हुए कहा, “हम आपसे भीख नहीं मांग रहे। बंगाल सिर झुकाकर नहीं चलता। हम फिर सत्ता में लौटेंगे और अपनी योजनाओं से लोगों की सेवा करेंगे।”

यह विवाद तभी और गहरा हो गया जब यह याद किया गया कि 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज कर दिया था जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के 18 जून के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि मनरेगा को राज्य में 1 अगस्त 2025 से लागू किया जा सकता है, और “शर्तें तय करना” केंद्र के विवेक पर निर्भर होगा। कोर्ट के इसी निर्देश के बाद केंद्र ने इन शर्तों के साथ योजना बहाल करने का फैसला किया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह टकराव आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। मनरेगा बंगाल में लाखों ग्रामीण मजदूरों की आजीविका से सीधे जुड़ा मुद्दा है। केंद्र द्वारा नई शर्तें लगाने को तृणमूल कांग्रेस “राजनीतिक दबाव बनाने” का प्रयास बता रही है, वहीं भाजपा इसे “पारदर्शिता और जवाबदेही” का कदम बता रही है। दोनों पक्ष इस मुद्दे पर जनता को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि मनरेगा पर जारी यह टकराव बंगाल चुनाव की जमीन पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है। एक तरफ ममता सरकार इसे “राज्य की गरिमा पर हमला” बता रही है, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार का दावा है कि मनरेगा के क्रियान्वयन में भारी अनियमितताएँ मिली थीं, जिन्हें सुधारने के लिए ये शर्तें लगाई गई हैं।

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