नई दिल्ली
2014 में 21 साल के सारांश जैन ऑस्ट्रेलिया दौरे पर थे. सीमित ओवरों की क्रिकेट में अपना भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे सारांश जब भी घर फोन करते, तो मां और बड़े भाई यही कहते कि पिता सुबोध जैन किसी काम में व्यस्त हैं. उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनके पहले कोच और सबसे बड़े प्रेरणास्रोत पिता जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं.
ऑस्ट्रेलिया से लौटने पर जो सच सामने आया, उसने सारांश को भीतर तक तोड़ दिया. उनके पिता को मुंह का कैंसर हो चुका था. बड़ी सर्जरी के बाद उनका चेहरा सूज गया था और वह बोल भी नहीं पा रहे थे. बेटे ने जैसे ही पिता को उस हालत में देखा, वह फूट-फूटकर रो पड़ा.
लेकिन उस दिन पिता ने आवाज नहीं, बल्कि कलम का सहारा लिया. उन्होंने कागज पर सिर्फ एक लाइन लिखी- ‘बेटा, तू जितना अच्छा करेगा, मैं उतनी जल्दी ठीक हो जाऊंगा.’
यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था, बल्कि बेटे के जीवन का सबसे बड़ा संकल्प बन गया.
12 साल बाद वही बेटा भारतीय टेस्ट टीम में चुना गया. मंगलवार को चयनकर्ताओं ने जैसे ही टीम का ऐलान किया, पिता की वह पर्ची और उस पर लिखे शब्द सच साबित हो गए. संयोग देखिए कि हर मंगलवार की तरह सारांश उस समय हनुमान मंदिर में पूजा कर रहे थे. मंदिर से बाहर निकलते ही उन्हें अपने चयन की खबर मिली.
सुबोध जैन के लिए यह सिर्फ बेटे का चयन नहीं था, बल्कि उनके अपने अधूरे सपने की भी जीत थी. मध्य प्रदेश के लिए रणजी ट्रॉफी खेलने वाले सुबोध खुद भारत के लिए नहीं खेल सके. उन्हें हमेशा यह मलाल रहा कि उनका सफर वहीं रुक गया. अब वही सपना उनके बेटे ने पूरा कर दिया.
सुबोध ने अपने बेटे को ऑफ स्पिन की बारीकियां सिखाईं. शुरुआती दिनों में वही उसके आदर्श थे. बाद में सारांश ने रविचंद्रन अश्विन के वीडियो देखकर अपने खेल को और निखारा, लेकिन नींव पिता ने ही रखी थी.
सारांश का सफर भी आसान नहीं रहा. रणजी ट्रॉफी के डेब्यू मैच में 5 विकेट लेने के बावजूद उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया. कई खिलाड़ी यहां टूट जाते हैं, लेकिन सारांश ने हार नहीं मानी. दलीप ट्रॉफी में 16 विकेट, ईरानी कप में शानदार प्रदर्शन और रणजी ट्रॉफी में मध्य प्रदेश को चैम्पियन बनाने में अहम योगदान ने आखिरकार चयनकर्ताओं का ध्यान उनकी ओर खींच लिया.
आज जब सारांश भारतीय टेस्ट टीम की जर्सी पहनने जा रहे हैं, तो यह सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं है. यह उस पिता की जीत भी है, जिसने कैंसर से लड़ते हुए अपनी आवाज खो दी थी, लेकिन अपने बेटे के हौसले को कभी टूटने नहीं दिया.
और शायद इसलिए, टीम इंडिया में सारांश जैन का चयन सिर्फ एक क्रिकेट खबर नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि कुछ सपने समय जरूर लेते हैं, लेकिन अगर हौसला जिंदा रहे तो वे एक दिन सच होकर ही रहते हैं.
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