OP RAJBHAR: ओपी राजभर ने छेड़ा कोटे में कोटे का रागOP RAJBHAR: ओपी राजभर ने छेड़ा कोटे में कोटे का राग

OP RAJBHAR: ओपी राजभर ने छेड़ा कोटे में कोटे का राग

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की सरगर्मी के बीच राज्य सरकार में सहयोगी और पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने एक बार फिर से “कोटे में कोटे” की मांग को उठाकर सियासी हलचल तेज कर दी है। राजभर ने कहा है कि, वो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के आरक्षण में वर्गीकरण की मांग रखेंगे। उनका कहना है कि, त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अत्यंत पिछड़ी और सर्वाधिक पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण में अलग से कोटा निर्धारित किया जाना चाहिए।

राजभर का तर्क है कि, मौजूदा आरक्षण व्यवस्था का लाभ कुछ सीमित और प्रभावशाली जातियों तक सिमट कर रह गया है। उन्होंने कहा कि, प्रदेश की बड़ी संख्या में ऐसी जातियां हैं जिन्हें आज तक आरक्षण का समुचित लाभ नहीं मिला है। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय का सवाल बताते हुए कहा कि, अगर समय रहते उपवर्गीकरण नहीं किया गया, तो वंचित वर्गों के साथ अन्याय होगा।

पंचायती राज मंत्री ने स्पष्ट किया कि, इस मुद्दे को लेकर वे जल्द ही विधानमंडल में प्रस्ताव लाने की मांग करेंगे ताकि “कोटे में कोटे” की व्यवस्था को कानूनी रूप दिया जा सके। उनके मुताबकि, इस प्रक्रिया के लिए एक विधायी पहल की आवश्यकता होगी, जिससे आरक्षण के लाभ को संतुलित और न्यायोचित तरीके से वितरित किया जा सके।

सरकार द्वारा पहले गठित सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए राजभर ने बताया कि, समिति ने ओबीसी आरक्षण के 27 प्रतिशत को तीन भागों में विभाजित करने की सिफारिश की थी। इस रिपोर्ट में 7 प्रतिशत कोटा पिछड़ी जातियों के लिए, 9 प्रतिशत कोटा अति पिछड़ी जातियों के लिए और 11 प्रतिशत कोटा सर्वाधिक पिछड़ी जातियों के लिए प्रस्तावित किया गया है। समिति ने इन वर्गों में 16, 32 और 57 जातियों को शामिल किया है।

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने इस मांग पर फिलहाल असहमति जताई है। पार्टी के एक प्रदेश पदाधिकारी के अनुसार, पंचायत चुनाव को संविधान के वर्तमान प्रावधानों के तहत ही कराया जाना तय है। उन्होंने कहा कि, “कोटे में कोटा” का मुद्दा संवेदनशील है…. और इस पर तुरंत कोई निर्णय लेना व्यावहारिक नहीं है।

उधर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति के आरक्षण में उपवर्गीकरण के संबंध में दिए गए निर्देशों का भी हवाला राजभर दे रहे हैं। उनका कहना है कि जब उच्चतम न्यायालय ने इस दिशा में रास्ता दिखाया है, तो सरकार को इसमें पीछे नहीं हटना चाहिए।

राजभर की ये मांग न सिर्फ उनके समर्थक वोट बैंक को साधने की रणनीति मानी जा रही है, बल्कि ये सामाजिक न्याय की पुरानी बहस को फिर से उभारने की कोशिश भी है। अब देखना ये होगा कि, भाजपा नेतृत्व इस संवेदनशील लेकिन अहम मांग पर क्या रुख अपनाता है और पंचायत चुनाव के ठीक पहले इस मुद्दे पर क्या कोई ठोस निर्णय सामने आता है या नहीं।