Magh Mela Administration: माघ मेला प्रशासन पर शंकराचार्य का पलटवारMagh Mela Administration: माघ मेला प्रशासन पर शंकराचार्य का पलटवार

Magh Mela Administration: माघ मेला प्रशासन पर शंकराचार्य का पलटवार

माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान करने से रोके जाने का मामला अब गंभीर कानूनी और धार्मिक विवाद का रूप ले चुका है। इस मुद्दे पर मेला प्रशासन और शंकराचार्य आमने-सामने आ गए हैं। मेला प्रशासन की ओर से पहले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा गया था, जिसके जवाब में अब उन्होंने प्रयागराज मेला प्राधिकरण को कानूनी नोटिस भेजकर पलटवार किया है।

यह कानूनी नोटिस अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा के माध्यम से प्रयागराज मेला प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को भेजा गया है। नोटिस में मेला प्रशासन की कार्रवाई को न केवल अपमानजनक बताया गया है, बल्कि इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करार दिया गया है। शंकराचार्य की ओर से भेजे गए नोटिस में साफ कहा गया है कि मेला प्रशासन 24 घंटे के भीतर अपना भेजा गया पत्र वापस ले, अन्यथा उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

कानूनी नोटिस में कहा गया है कि शंकराचार्य पद को लेकर पूरा विवाद पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में मेला प्रशासन द्वारा इस विषय में हस्तक्षेप करना सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को चुनौती देने जैसा है। नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रशासन की यह कार्रवाई कानून के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आती है। यदि मेला प्रशासन अपना पत्र वापस नहीं लेता है तो उसके खिलाफ मानहानि और अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाएगी।

शंकराचार्य की ओर से भेजे गए नोटिस में 19 जनवरी की रात की घटना का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। नोटिस के अनुसार, उस रात मेला प्रशासन ने पुलिस बल के साथ उनके शिविर के प्रवेश द्वार पर नोटिस चस्पा किया था। उस समय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती सो रहे थे। इस कार्रवाई को ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ संस्था का सीधा अपमान और अनादर बताया गया है। नोटिस में कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई से न केवल शंकराचार्य की गरिमा को ठेस पहुंची है, बल्कि धार्मिक भावनाओं का भी अपमान हुआ है।

विवाद की जड़ में मेला प्रशासन द्वारा भेजा गया वह नोटिस है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से उनके ‘शंकराचार्य’ पद की वैधानिकता से जुड़े प्रमाण मांगे गए थे। प्रशासन का कहना था कि जब तक पद से संबंधित वैधानिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाते, तब तक उन्हें माघ मेले में शंकराचार्य के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर उनके स्नान को लेकर आपत्ति जताई गई थी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से इस नोटिस का आठ पन्नों में विस्तृत जवाब दिया गया था। अपने जवाब में उन्होंने प्रशासन द्वारा दिए गए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हवाले पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि नोटिस में जिस सुप्रीम कोर्ट के आदेश का जिक्र किया गया है, वह 14 अक्टूबर 2022 का है, जबकि उससे पहले ही शंकराचार्य पद को लेकर प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने स्पष्ट किया कि 11 सितंबर 2022 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के अगले दिन, यानी 12 सितंबर 2022 को, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के आश्रम में उनका विधिवत पट्टाभिषेक हो चुका था। उनका कहना है कि इस तथ्य को नजरअंदाज कर प्रशासन ने जो नोटिस भेजा है, वह न केवल तथ्यों से परे है बल्कि दुर्भावनापूर्ण भी है।

कानूनी नोटिस में यह भी कहा गया है कि धार्मिक पदों और परंपराओं को लेकर प्रशासन को सीमित दायरे में रहकर काम करना चाहिए। शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धार्मिक पद को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सवाल उठाना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। नोटिस में प्रशासन से यह अपेक्षा जताई गई है कि वह न्यायालय के अंतिम निर्णय तक किसी भी प्रकार की हस्तक्षेपकारी कार्रवाई से बचे।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद माघ मेला क्षेत्र में हलचल तेज हो गई है। साधु-संतों और धार्मिक संगठनों के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई है। कई संत संगठनों का कहना है कि शंकराचार्य पद की गरिमा सर्वोपरि है और प्रशासन को धार्मिक मामलों में संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।

वहीं, मेला प्रशासन की ओर से अब तक इस कानूनी नोटिस पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को कानूनी दृष्टि से परखा जा रहा है। इस विवाद ने माघ मेले की व्यवस्थाओं और धार्मिक अधिकारों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है, जिसमें प्रशासनिक अधिकार, न्यायिक प्रक्रिया और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन का सवाल केंद्र में आ गया है।