Harihar Yojana: एक भावुक पल से हुई ‘हरिहर योजना’ की ‘मनोहर’ शुरुआत!
सरकारी नीतियां अक्सर दफ्तरों के बंद कमरों में, फाइलों और आंकड़ों को देखकर बनाई जाती हैं…. लेकिन कुछ योजनाएं ऐसी होती हैं, जिनका जन्म किसी के आंसू पोंछने और सीधे दिल से निकली तड़प को समझने के बाद होता है। हरियाणा की ‘हरिहर योजना’ भी एक ऐसी ही भावुक और संवेदनशील कहानी की देन है… इस योजना के पीछे की पूरी कहानी खुद देश के केंद्रीय मंत्री और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एक मंच से साझा की… ये किस्सा सिर्फ एक सरकारी पॉलिसी की शुरुआत नहीं, बल्कि एक लावारिस बच्चे को पहचान और सम्मान दिलाने का एक मानवीय सफर है। आइए जानते हैं कि आखिर वो क्या वाकया था, जिसने एक मुख्यमंत्री को रात के सन्नाटे में सोचने पर मजबूर कर दिया और जन्म हुआ एक ऐतिहासिक ‘हरिहर योजना’ का।
रात 10 बजे, जब एक अनजान लड़का रो पड़ा
बात करीब 6-7 साल पहले की है। साल 2019 में 15 अगस्त के मौके पर मनोहर लाल को एक जिले में झंडा फहराना था। 14 अगस्त की रात करीब 10:00 बजे वह अपने रेस्ट हाउस के कमरे में बैठे थे। तभी उनके स्टाफ का एक पीएसओ और वहां का एक स्थानीय राजनीतिक व्यक्ति एक नौजवान लड़के को लेकर उनके पास पहुंचे। उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा कि ये लड़का आपसे कुछ जरूरी बात करना चाहता है।
मनोहर लाल ने सहजता से कहा, “बोल बेटे, क्या बात है?” लेकिन वो लड़का कुछ बोलने के बजाय फूट-फूटकर रोने लगा। कमरे में अजनबी लोगों की मौजूदगी देखकर मुख्यमंत्री समझ गए कि शायद ये सबके सामने अपनी बात नहीं कह पा रहा है। उन्होंने तुरंत अपने स्टाफ और उस नेता को कमरे से बाहर भेज दिया। कमरे में अब सिर्फ मुख्यमंत्री और वह रोता हुआ लड़का थे। मनोहर लाल ने उसे चुप कराया, ढांढस बंधाया और पूछा, “बता तो सही, क्या बात है?”
रेस्ट हाउस का कमरा और मुख्यमंत्री की गारंटी
लड़के का दर्द सुनकर मनोहर लाल भावुक हो गए। उन्होंने तुरंत उसे तसल्ली दी और कहा कि अब चिंता मत करो। उन्होंने उसी वक्त जिले के DC को फोन लगाया और आदेश दिया, “आज से इस रेस्ट हाउस का एक कमरा इस बच्चे को दे दो। जब तक मेरा अगला आदेश न आए, ये यहीं रहेगा, यहीं खाएगा-पिएगा और इसकी पूरी देखभाल होगी।”
जब दिमाग में कौंधा ‘हरिहर योजना’ का विचार
वो लड़का धीरे-धीरे बड़ा होने लगा और मुख्यमंत्री से उसका मिलना-जुलना जारी रहा। एक दिन मनोहर लाल ने उससे पूछा, “तुम्हारे जैसे और कितने बच्चे होंगे जो इस तरह भटक रहे हैं?” लड़के ने जवाब दिया, “जी, 10-12 बच्चे तो अभी मेरी जानकारी में हैं जो हमारे साथ बाल गृह में रहते थे और 18 साल के होते ही बाहर निकाल दिए गए। आज वे सब सड़कों पर भटक रहे हैं।”
मुख्यमंत्री ने उससे पूछा कि, “फिर उनके लिए क्या किया जा सकता है? तुम ही बताओ क्या योजना होनी चाहिए?” उस लड़के ने कुछ राज्यों के उदाहरण दिए कि कहां क्या व्यवस्था है। इसके बाद मनोहर लाल ने तुरंत अपने महिला एवं बाल विकास विभाग (Women and Child Development Department) के अधिकारियों को तलब किया।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि ऐसे बच्चे, जिनके माता-पिता का कोई अता-पता नहीं है और जो 18 साल के बाद अनाथालय से निकाल दिए जाते हैं, उनकी 18 से 25 साल तक की उम्र की जिम्मेदारी सरकार कैसे उठाए, इसकी एक ठोस योजना तैयार की जाए। इसी सोच से जन्म हुआ ‘हरिहर योजना’ का।
इस योजना के तहत ये प्रावधान किया गया कि बाल गृहों से निकलने वाले अनाथ बच्चों की 18 से 25 साल तक की उम्र तक पूरी चिंता सरकार करेगी। अगर बच्चा आगे पढ़ना चाहता है, तो उसकी पढ़ाई का खर्च सरकार उठाएगी। अगर वो पढ़ना नहीं चाहता और नौकरी करना चाहता है, तो उसे सरकारी नौकरी दी जाएगी।
सबसे खास बात ये कि इस नौकरी के लिए उस बच्चे को न तो कोई लिखित परीक्षा (Exam) देनी होगी और न ही कोई इंटरव्यू देना होगा। उसे ‘एक्स-ग्रेशिया’ (अनुकंपा) के आधार पर सीधे सरकारी नौकरी मिलेगी। योजना बनते ही उसी साल ऐसे 12 बच्चों को बुलाया गया और उन्हें सरकारी नौकरी पर लगवाया गया।
इस कहानी में एक और भावुक मोड़ तब आया जब वो लड़का, जिससे मिलकर ये योजना बनी थी, वो उदास हो गया। चूंकि योजना बनने तक उसकी उम्र 25 साल पार हो चुकी थी, इसलिए वह तकनीकी रूप से इस योजना के दायरे में नहीं आ पा रहा था। उसने मायूस होकर कहा, “योजना तो दूसरों के लिए बन गई, लेकिन मेरा क्या हुआ? मेरा तो कुछ नहीं हुआ।”
तब मनोहर लाल ने उसे समझाते हुए कहा, “भाई, अपने बारे में नहीं सोचा करते, हमेशा सबके बारे में सोचा करते हैं। आज ये योजना बन गई है, तो आगे से किसी भी अनाथ बच्चे को यह परेशानी नहीं झेलनी पड़ेगी। रही बात तुम्हारी, तो तुम्हारी चिंता मैं खुद करूंगा।” इसके बाद मुख्यमंत्री ने नियमों में थोड़ी ढील दिलवाई, उस लड़के की सरकारी नौकरी लगवाई और बाद में उसकी शादी भी करवाई। आज वो लड़का अपने परिवार के साथ एक सम्मानजनक जीवन जी रहा है।
इस किस्से को पहली बार सार्वजनिक मंच से साझा करते हुए मनोहर लाल ने कहा कि, ये सब करने के लिए उन पर किसी का कोई दबाव नहीं था, न ही पहले से ऐसा कोई सरकारी नियम था। लेकिन, जनता की ताकत ही सरकार को ऐसे मानवीय नियम और कानून बनाने की शक्ति देती है।
आज हरियाणा में ‘हरिहर योजना’ के तहत हर साल अनाथ बच्चों को बिना किसी शोर-शराबे के, पूरी पारदर्शिता के साथ सरकारी नौकरियां दी जा रही हैं। यह योजना इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि अगर सत्ता में बैठे लोगों के भीतर संवेदनशीलता हो, तो एक अनजान बच्चे के आंसू भी एक बड़ी कल्याणकारी नीति का आधार बन सकते हैं।
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