गोरखपुर: गोरखनाथ मंदिर पहुंचे CDS अनिल चौहानगोरखपुर: गोरखनाथ मंदिर पहुंचे CDS अनिल चौहान

गोरखपुर: गोरखनाथ मंदिर पहुंचे CDS अनिल चौहान

गोरखपुर में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक और विचारोत्तेजक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जहां भारत के CDS जनरल अनिल चौहान ने गोरखनाथ मंदिर में आयोजित व्याख्यानमाला में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ महाराज और महंत अवैद्यनाथ महाराज की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित किया गया था। इस व्याख्यानमाला का विषय था “भारत के समक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां”, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे।

अपने संबोधन में जनरल अनिल चौहान ने राष्ट्रीय सुरक्षा की व्यापक परिभाषा प्रस्तुत करते हुए कहा कि “भूमि राष्ट्र की भौतिक पहचान है, लेकिन विचारधारा उसकी आत्मा होती है।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि, किसी भी राष्ट्र के संचालन के लिए विचारधारा उतनी ही आवश्यक है जितना कि शरीर के लिए रक्त। उनका यह वक्तव्य एक स्पष्ट संकेत था कि भारत की सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सांस्कृतिक, वैचारिक और सामाजिक पहलुओं की सुरक्षा भी शामिल है।

जनरल चौहान ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है, सैनिक तत्परता, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा। सबसे छोटे घेरे में सेना और रक्षा बलों की तैयारियां आती हैं, जो किसी भी आक्रमण का मुकाबला करने के लिए तैयार रहती हैं। दूसरा घेरा है राष्ट्रीय सुरक्षा, जिसमें आतंरिक सुरक्षा, आतंकवाद, साइबर हमले, आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा जैसी चीजें आती हैं। तीसरा और सबसे बड़ा घेरा है राष्ट्र सुरक्षा, जो राष्ट्र की वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक एकता की रक्षा करता है।

उन्होंने यह भी कहा कि आत्मनिर्भर भारत केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि रक्षा अनुसंधान और सैन्य स्वदेशीकरण के स्तर पर भी आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आने वाले समय में नेशनल डिफेन्स यूनिवर्सिटी की स्थापना जैसे संस्थान राष्ट्रीय सुरक्षा को एक नई दिशा दे सकते हैं।

कार्यक्रम में गोरखपुर विश्वविद्यालय के रक्षा अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष ने भी महंत दिग्विजयनाथ के शिक्षा और राष्ट्र निर्माण में योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि महंत जी का योगदान कोई बीता हुआ अध्याय नहीं, बल्कि एक सतत वर्तमान है, जो आज भी युवाओं को प्रेरणा देता है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा को समझाने के लिए सात अंधों और हाथी की प्रसिद्ध कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं को एक साथ समझना और समन्वयित करना कितना आवश्यक है।

सीडीएस ने भारत की भू-राजनीतिक स्थिति की जटिलताओं की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि भारत की सीमाएं सात देशों से लगती हैं, जिससे यह क्षेत्र सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील बन जाता है। उन्होंने कहा कि आज आतंकवाद में कमी जरूर आई है, लेकिन इसके नए स्वरूप उभर कर सामने आ रहे हैं, जो अप्रत्यक्ष और अदृश्य हैं, लेकिन उतने ही खतरनाक हैं।

एक दिन पहले, यानी 4 सितंबर को जनरल अनिल चौहान गोरखपुर पहुंचे थे, जहां उन्होंने गोरखा वार मेमोरियल के सौंदर्यीकरण और गोरखा म्यूजियम के शिलान्यास समारोह में हिस्सा लिया था। इसके बाद वे गोरखनाथ मंदिर पहुंचे और वहां पूजा-अर्चना की। उन्होंने गोरखनाथ मंदिर में ही रात्रि भोजन भी किया।

गोरखा वार मेमोरियल को लेकर जनरल चौहान ने कहा कि यह दिन गोरखपुर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1886 में कुनराघाट में गोरखा रिक्रूटमेंट डिपो की स्थापना की गई थी, जहां से नेपाली गोरखाओं की भारतीय सेना में भर्ती शुरू हुई।

जनरल चौहान ने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गोरखा सैनिकों ने अद्वितीय साहस और वीरता का परिचय दिया। उस युद्ध में लगभग 20,000 गोरखा सैनिक शहीद हुए थे। उनकी स्मृति में लगभग एक शताब्दी पूर्व यह गोरखा युद्ध स्मारक स्थापित किया गया था, जिसका अब नवीनीकरण किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि यह स्मारक तीन महत्वपूर्ण कारणों से ऐतिहासिक है—
1. यह गोरखा सैनिकों और भारतीय सेना के घनिष्ठ संबंधों की पहचान है।
2. यह गोरखा सैनिकों के बलिदान और बहादुरी को चिरस्थायी बनाएगा।

3. यह भारत-नेपाल संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करने की भारतीय सेना की प्रतिबद्धता को दर्शाएगा।

जनरल चौहान ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की रक्षा क्षमता को केवल सैन्य आयामों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आज के वैश्विक परिदृश्य में, साइबर सुरक्षा, सूचना युद्ध, जैविक खतरों, जलवायु परिवर्तन और अंतरिक्ष सुरक्षा जैसे विषय भी रक्षा नीति का हिस्सा बनने चाहिए।

उनका यह विचार स्पष्ट करता है कि भारतीय सेना और रक्षा नेतृत्व अब केवल परंपरागत युद्ध की तैयारी में नहीं, बल्कि आधुनिक व हाइब्रिड युद्ध की चुनौतियों का भी मुकाबला करने को तैयार है।
इस पूरे कार्यक्रम ने न केवल गोरखपुर जैसे सांस्कृतिक केंद्र में राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक व्यापक विमर्श को जन्म दिया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि जब राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व एक मंच पर आते हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा संभव होती है।

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