नई दिल्ली
स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों पर इस साल रिकॉर्ड गर्मी का बड़ा असर पड़ा है. 2026 में देश के ग्लेशियरों ने अपनी 5 फीसदी से ज्यादा बर्फ खो दी. यह जानकारी स्विस ग्लेशियर मॉनिटरिंग नेटवर्क यानी GLAMOS और स्विस एकेडमी ऑफ साइंसेज की रिपोर्ट में सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल सर्दियों में बर्फ कम गिरी. इसके बाद गर्मियों में बहुत ज्यादा गर्मी पड़ी. इससे ग्लेशियरों की बर्फ तेजी से पिघल गई।
पिछले सिर्फ 5 साल में स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर करीब 20 फीसदी बर्फ खो चुके हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि अब हर कुछ साल में नहीं, बल्कि लगातार ऐसे साल आ रहे हैं जब ग्लेशियरों को बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है. इसका असर आगे पानी की सप्लाई पर भी पड़ सकता है, क्योंकि गर्मियों में ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी कई जगहों के लिए जरूरी होता है।
सर्दियों में कम बर्फ, गर्मियों में ज्यादा गर्मी
इस साल ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की दो बड़ी वजह रहीं. पहली, सर्दियों में कम बर्फबारी और दूसरी, गर्मियों में रिकॉर्ड गर्मी. ग्लेशियरों पर सर्दियों में जमा होने वाली बर्फ गर्मियों में उनके लिए एक तरह की सुरक्षा का काम करती है. लेकिन इस साल नई बर्फ कम जमा हुई।
इसके बाद गर्मियों में तापमान बहुत ज्यादा बढ़ गया. मई से सितंबर के बीच गर्म और सूखा मौसम रहा. कई ऊंचे पहाड़ी इलाकों में भी तापमान जमने वाले स्तर से ऊपर रहा. इससे ग्लेशियरों की पुरानी बर्फ भी तेजी से पिघलने लगी. GLAMOS के डायरेक्टर मैथियास हुस के मुताबिक, अब ग्लेशियरों के लिए बहुत ज्यादा बर्फ पिघलने वाले साल बार-बार देखने को मिल रहे हैं. उनके मुताबिक, यह स्थिति चिंता की बात है।
एलेट्श ग्लेशियर में सबसे ज्यादा पिघली बर्फ
स्विट्जरलैंड के सबसे बड़े ग्लेशियर एलेट्श में इस साल अब तक का सबसे ज्यादा पिघलाव दर्ज किया गया. ग्लेशियर डी त्सानफ्लूरॉन की औसत मोटाई भी 4 मीटर से ज्यादा कम हो गई. कुछ छोटे ग्लेशियर इस साल पूरी तरह गायब हो गए. हालांकि 2026 में बर्फ पिघलने की रफ्तार 2022 के रिकॉर्ड से थोड़ी कम रही. साल 2022 में नॉर्थ अफ्रीका से आई धूल बर्फ पर जम गई थी. इससे बर्फ ने सूरज की ज्यादा गर्मी सोखी और तेजी से पिघली।
3 महीने में 2.2 ट्रिलियन लीटर पानी पिघला
वैज्ञानिकों के मुताबिक, जुलाई से सितंबर के बीच स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों से करीब 2.2 ट्रिलियन लीटर पानी पिघला. यह मात्रा स्विट्जरलैंड के घरों में एक साल में इस्तेमाल होने वाले पीने के पानी से 4 गुना से भी ज्यादा है. ग्लेशियरों से इतना पानी निकलने का फिलहाल एक फायदा भी है. गर्मियों में जब पानी कम होता है, तब ग्लेशियरों से पिघलकर आने वाला पानी नदियों और दूसरे जल स्रोतों तक पहुंचता है. इससे पानी की कमी कुछ हद तक कम होती है. लेकिन ग्लेशियर जितने छोटे होते जाएंगे, उनसे मिलने वाला पानी भी कम होता जाएगा. यानी अभी जो फायदा मिल रहा है, वह हमेशा नहीं रहेगा।
5 साल में 20% बर्फ खत्म
पिछले 5 साल में स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर करीब 20 फीसदी बर्फ खो चुके हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह काफी तेज गिरावट है. अगर गर्मी बढ़ने और कम बर्फबारी का सिलसिला जारी रहा, तो ग्लेशियर लगातार छोटे होते जाएंगे. इसका असर सिर्फ पहाड़ों पर नहीं पड़ेगा. ग्लेशियरों से मिलने वाला पानी गर्मियों में कई इलाकों के लिए जरूरी है. इसलिए बर्फ के लगातार कम होने से आने वाले समय में पानी की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है।
