दिल्ली के बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक अहम खबर सामने आई है। बिजली नियामक संस्था DERC ने राजधानी की तीनों बड़ी बिजली कंपनियों BRPL, BYPL और TPDDL को अप्रैल 2026 से पावर पर्चेज एडजेस्टमेंट चार्ज (PPAC) वसूलने की अनुमति दे दी है। यह चार्ज बिजली खरीद की बढ़ी हुई लागत को पूरा करने के लिए लगाया जाता है।
इस फैसले के बाद दिल्ली में बिजली बिल में करीब 1% से 3.30% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। खास बात यह है कि यह पहली बार होगा जब दिल्ली में PPAC हर तीन महीने की बजाय हर महीने लागू किया जाएगा। इसका मतलब है कि अब बिजली दरों की समीक्षा और बदलाव ज्यादा तेजी से हो सकते हैं।
PPAC क्या होता है?
PPAC एक ऐसा अतिरिक्त शुल्क है, जो बिजली कंपनियां तब लगाती हैं जब बिजली उत्पादन या खरीदने की लागत बढ़ जाती है। जैसे कोयले और ईंधन के महंगे होने से बिजली बनाना महंगा हो जाता है, तो उस बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों से वसूला जाता है।
यह व्यवस्था पहले से ही देश के कई राज्यों में लागू है और इसे नियमों के तहत जरूरी माना जाता है।
कितना बढ़ेगा बिल?
DERC ने तीनों कंपनियों के लिए अलग-अलग PPAC तय किया है:
- BRPL (दक्षिण दिल्ली): 17.94%
- BYPL (पूर्वी दिल्ली): 17.43%
- TPDDL (उत्तर और पश्चिम दिल्ली): 16%
हालांकि कंपनियों ने इससे ज्यादा दरें मांगी थीं, लेकिन नियामक आयोग ने कम दरें ही मंजूर की हैं।
आम लोगों पर असर
इस बढ़ोतरी का असर सभी उपभोक्ताओं पर एक जैसा नहीं होगा। जिन लोगों को सरकार से सब्सिडी मिलती है और जो 200 से 500 यूनिट के बीच बिजली इस्तेमाल करते हैं, उनके बिल पर इसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
लेकिन जो उपभोक्ता ज्यादा बिजली खर्च करते हैं या सब्सिडी के दायरे से बाहर हैं, उनके बिल में 7% से 18% तक का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है।
नया नियम क्या कहता है?
नए नियमों के मुताबिक अगर किसी महीने पूरा PPAC वसूला नहीं जा पाता, तो बची हुई रकम को आगे के महीनों में धीरे-धीरे वसूला जाएगा।
क्यों लिया गया यह फैसला?
बिजली कंपनियों को पावर जनरेट करने वाली कंपनियों को समय पर भुगतान करना होता है। अगर यह चार्ज नहीं लिया जाए, तो डिस्कॉम पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है और बाद में ब्याज समेत बड़ा बोझ उपभोक्ताओं पर आ सकता है। इसलिए PPAC को समय-समय पर लागू करना जरूरी माना जाता है ताकि सिस्टम में वित्तीय स्थिरता बनी रहे।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि डिस्कॉम्स ज्यादा वसूली की कोशिश करते हैं और इस प्रक्रिया में उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। उनका मानना है कि इस तरह के फैसलों की गहराई से समीक्षा होनी चाहिए ताकि आम लोगों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
