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पूर्व आईपीएल कमिश्नर और क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सोमवार को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आर महादेवन की पीठ ने ललित मोदी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा फेमा के उल्लंघन के तहत लगाए गए जुर्माने की भरपाई की मांग की थी। ललित मोदी ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि बीसीसीआई उन्हें क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य है क्योंकि वह उस समय बोर्ड के उपाध्यक्ष और आईपीएल की संचालन समिति के अध्यक्ष थे।

कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी: दीवानी उपचार का रास्ता खुला है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ललित मोदी यदि चाहें तो उपलब्ध दीवानी उपचारों (सिविल रेमेडीज) का सहारा ले सकते हैं। लेकिन न्यायालय इस याचिका के माध्यम से बीसीसीआई को किसी प्रकार का निर्देश देने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रकार की याचिका का कोई कानूनी आधार नहीं है और इसे गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी ठुकराई थी याचिका

इससे पहले 19 दिसंबर 2023 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी ललित मोदी की यह याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने न केवल याचिका को ‘तुच्छ’ और ‘पूरी तरह से गलत’ करार दिया, बल्कि ललित मोदी पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि प्रवर्तन निदेशालय द्वारा फेमा (FEMA – Foreign Exchange Management Act) के अंतर्गत लगाया गया जुर्माना ललित मोदी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी है और बीसीसीआई को इस भुगतान के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

Supreme Court junks Lalit Modi plea seeking BCCI to pay ED penalty

बीसीसीआई राज्य नहीं, इसलिए संवैधानिक आदेश लागू नहीं

हाईकोर्ट ने 2005 के सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बीसीसीआई संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत परिभाषित ‘राज्य’ नहीं है। इसका मतलब है कि बीसीसीआई पर वैसी संवैधानिक बाध्यताएं लागू नहीं होतीं जैसी कि सरकारी संस्थाओं पर होती हैं। इसलिए अदालत बीसीसीआई को रिट जारी कर किसी प्रकार का भुगतान करने का आदेश नहीं दे सकती।

ललित मोदी का पक्ष: बीसीसीआई से अधिकारिक क्षतिपूर्ति की मांग

ललित मोदी ने अपनी याचिका में कहा कि जब वह बीसीसीआई के उपाध्यक्ष थे, उसी दौरान उन्होंने आईपीएल के संचालन से जुड़े कई निर्णय लिए। उनका कहना था कि फेमा उल्लंघन उन्हीं निर्णयों के कारण हुआ, इसलिए बीसीसीआई को जिम्मेदारी लेकर क्षतिपूर्ति करनी चाहिए। उन्होंने बीसीसीआई के उपनियमों और आंतरिक नीतियों का हवाला दिया।

लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कोई ऐसा मामला नहीं है जिसमें सार्वजनिक हित का कार्य हुआ हो। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत कार्रवाई है और बीसीसीआई को इस संदर्भ में जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत की सख्त टिप्पणी: सार्वजनिक कार्य का कोई संबंध नहीं

हाईकोर्ट ने कहा था कि ईडी द्वारा लगाए गए जुर्माने के सन्दर्भ में यह याचिका पूरी तरह से गलत है। इसमें कोई सार्वजनिक कार्य नहीं जुड़ा है और न ही कोई संवैधानिक प्रश्न उठता है। इसलिए बीसीसीआई को रिट आदेश द्वारा किसी भी भुगतान के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

टाटा मेमोरियल को दान देने का आदेश

हाईकोर्ट ने ललित मोदी पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए आदेश दिया था कि वह यह राशि चार सप्ताह के भीतर टाटा मेमोरियल अस्पताल को दान के रूप में दें। यह आदेश यह दिखाने के लिए था कि अदालत तुच्छ और व्यर्थ याचिकाओं पर समय और संसाधनों की बर्बादी को बिल्कुल सहन नहीं करेगी।

फेमा के उल्लंघन का मामला क्या है?

फेमा के तहत प्रवर्तन निदेशालय ने ललित मोदी पर ₹10.65 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। यह जुर्माना आईपीएल संचालन के दौरान विदेशी मुद्रा नियमों के उल्लंघन के लिए लगाया गया था। ललित मोदी का तर्क था कि उन्होंने जो निर्णय लिए वह बीसीसीआई के अधिकृत पद पर रहते हुए लिए गए, इसलिए इसका दायित्व भी बीसीसीआई का है। हालांकि, ईडी और न्यायालय इस तर्क से सहमत नहीं हुए।

बीसीसीआई का जवाब: कोई संविदात्मक जिम्मेदारी नहीं

बीसीसीआई की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि ललित मोदी का कार्यकाल बोर्ड के लिए संविदात्मक (Contractual) नहीं था और उनके द्वारा लिए गए निर्णयों के लिए बोर्ड जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, उन्होंने कहा कि बोर्ड के उपनियमों में भी ऐसी कोई शर्त नहीं है जिसमें पूर्व पदाधिकारी को आर्थिक क्षति की भरपाई का वादा किया गया हो।

आईपीएल में विवादों से भरा कार्यकाल

ललित मोदी का आईपीएल से जुड़ा कार्यकाल हमेशा विवादों में रहा है। 2008 में आईपीएल की शुरुआत के समय से ही उन पर नियमों की अनदेखी और पारदर्शिता की कमी के आरोप लगे। 2010 में उन्हें बीसीसीआई ने निलंबित कर दिया और बाद में बोर्ड से बाहर कर दिया गया। इसके बाद ललित मोदी लंदन में बस गए और भारत नहीं लौटे। उन पर कई आर्थिक और कानूनी कार्यवाहियां लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या दर्शाता है?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दर्शाता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितने भी प्रभावशाली पद पर रहा हो, कानून से ऊपर नहीं है। यदि कोई जुर्माना लगता है तो उसकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी और उसे किसी संस्था पर नहीं थोपा जा सकता। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक नज़ीर (precedent) के रूप में देखा जाएगा।

 

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