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शाह के बयान पर अशोक गहलोत “मंत्रियों के बच्चे ले रहे अंग्रेजी शिक्षा”

 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान – “अंग्रेज़ी बोलने वाले पछताएंगे” – पर सियासत गर्मा गई है। इस बयान को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा और आरएसएस पर कड़ा हमला बोला है। गहलोत ने आरोप लगाया कि भाजपा और संघ परिवार अंग्रेज़ी का विरोध केवल दिखावे के लिए करते हैं, जबकि उनके नेता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ाते हैं और विदेश भेजते हैं।

गहलोत ने सवाल उठाया कि जब भाजपा के नेता खुद अंग्रेज़ी शिक्षा का लाभ अपने बच्चों को दिलवा रहे हैं, तो फिर देश की आम जनता को उससे क्यों दूर रखा जा रहा है? उन्होंने कहा, “देश की जनता यह सब समझती है। जो नेता मंच पर खड़े होकर अंग्रेज़ी के खिलाफ बातें करते हैं, वही अपने बच्चों को विदेश भेजते हैं।

गहलोत ने इस बहस के बीच अपनी सरकार द्वारा शुरू की गई महात्मा गांधी इंग्लिश मीडियम स्कूल योजना को पूरे देश के लिए रोल मॉडल बताया। उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्ग के बच्चों को अंग्रेज़ी शिक्षा के दायरे में लाने के लिए राज्यभर में 3700 से अधिक अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल खोले। इन स्कूलों में अब तक करीब 6.5 लाख बच्चों ने नामांकन लिया है, जो यह दर्शाता है कि आम जनता में अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षा को लेकर जबरदस्त उत्साह है।

गहलोत ने कहा कि उनकी सरकार ने न केवल स्कूल खोले, बल्कि इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए विशेष अंग्रेज़ी माध्यम कैडर भी तैयार किया और 10,000 से अधिक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा की सरकार ने सत्ता में आने के बाद इन स्कूलों को बंद करने की कोशिश की, लेकिन जनता के विरोध और स्कूलों की लोकप्रियता के चलते ऐसा नहीं कर पाई।

गहलोत ने कहा कि भाजपा और आरएसएस का अंग्रेज़ी विरोध जनता को गुमराह करने वाला है। उन्होंने कहा, “भाजपा के नेता मंच पर हिंदी प्रेम का दिखावा करते हैं, लेकिन उनके अपने मंत्रीगण और वरिष्ठ नेता अपने बच्चों को विदेशों में अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ा रहे हैं। ऐसे में जनता इनकी दोहरी नीति को बखूबी समझती है।”

उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी हिंदी के पक्षधर रहे हैं, लेकिन उन्होंने समय की जरूरत को समझते हुए अंग्रेज़ी को भी उतना ही महत्व दिया है। गहलोत के अनुसार, “बचपन में हम भी अंग्रेज़ी का विरोध करते थे, लेकिन समय के साथ हमने अपनी सोच बदली। आज की दुनिया में कंप्यूटर, इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में अंग्रेज़ी एक अनिवार्य भाषा बन चुकी है।”

अशोक गहलोत के बयान ने इस बहस को एक नया मोड़ दे दिया है कि यह लड़ाई केवल हिंदी बनाम अंग्रेज़ी की नहीं है, बल्कि यह अवसरों की बराबरी की है। गरीब और ग्रामीण वर्ग के बच्चे भी उच्च गुणवत्ता की अंग्रेज़ी शिक्षा पा सकें, यह सुनिश्चित करना सरकारों की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

गहलोत का तर्क है कि भाजपा का विरोध इस दिशा में एक सकारात्मक प्रयास को रोकने की कोशिश है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है, तब क्या भारत के युवाओं को अंग्रेज़ी से दूर रखना उनके भविष्य के साथ अन्याय नहीं होगा?

अमित शाह के बयान ने राजनीतिक हलकों में बहस तो छेड़ी ही है, साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि शिक्षा को लेकर विचारधारात्मक मतभेद अब और अधिक उभरकर सामने आ रहे हैं। अशोक गहलोत ने अपनी बातों से यह संदेश देने की कोशिश की है कि आधुनिक भारत में शिक्षा, खासकर अंग्रेज़ी शिक्षा, किसी वर्ग विशेष की नहीं बल्कि सभी का अधिकार है। भाजपा पर लगाए गए दोहरे रवैये के आरोपों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आगे की राजनीति में यह बहस क्या नया मोड़ लेती है।

 

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