अखिलेश के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हुए झूठे साबित!अखिलेश के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हुए झूठे साबित!

अखिलेश के ‘वोट चोरी’ वाले दावे हुए झूठे साबित!

उत्तरप्रदेश की राजनीति में जाना माना चेहरा अखिलेश यादव…. हर बार जब भाजपाईयों पर कोई आरोप लगाते हैं, तो उनको उन्हीं की भाषा में जवाब देकर चुप करवाने का प्रयास किया जाता है… लेकिन साहब ये अखिलेश यादव हैं, जो विपक्ष की भूमिका अपने तन मन और धन से निभा रहे हैं, हर एक चीज पर बारिकी से नजर बनाए हुए हैं, और लगातार बीजेपी पर आक्रामक रूख भी बनाए हुए है।

अभी देखिए ताजा मामला है वोट चोरी का। जहां एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर ये मुद्दा गहराता जा रहा है, वहीं अब इस मुद्दे को लेकर यूपी में भी सियासत होनी शुरू हो चुकी है। बात की शुरूआत थोड़ी पुरानी है… 2022 की। विपक्षी पार्टियां अक्सर EVM को सवालों के घेरे में डालती रही है। वही राहुल गांधी ने भी वोट चोरी को BJP के खिलाफ हथियार बनाया हुआ है। ऐसा ही कुछ अखिलेश यादव ने 2022 में किया था।

अखिलेश ने चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाया था। इसके लिए 18 हजार हलफनामे जमा किए थे। अब तीन साल बाद इनमें से 15 हलफनामों की जांच पूरी हुई है। और जांच में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के दावों को तीन जिलों के DM ने गलत ठहराया है।

जौनपुर, कासगंज और बाराबंकी के डीएम ने मंगलवार देर रात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि जो शिकायतें उनके पास आई थीं, उनकी जांच कर ली गई हैं। जांच में पता चला है कि कुछ नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे, क्योंकि वे दूसरे स्थान पर पहले से दर्ज थे। कुछ लोगों की पहले ही मौत हो चुकी है, इसलिए उनके नाम डिलीट कर दिए गए।

इसके बाद से अखिलेश यादव तीनों जिलाधिकारियों पर हमलावर हैं। कहा- क्यों इतने सालों बाद जवाब आया है? जनता अब इस ’त्रिगुट’ को अदालत लगाएगी। इनकी संलिप्तता की भी जांच होनी चाहिए।
आइए जरा आपको पूरे मामले से अवगत करवाती हूं

17 अगस्त को दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। वहां उनसे पूछा गया कि अखिलेश यादव ने 18 हजार नामों का हलफनामा दिया है, लेकिन आयोग ने अभी तक उसका जवाब क्यों नहीं दिया। इस पर ज्ञानेश कुमार ने कहा था कि, आयोग को ऐसा कोई हलफनामा नहीं मिला।

वही जांच को बाद तीनों डीएम ने कहा कि
• जौनपुर में 5 नाम काटने की शिकायत मिली थी। जांच में सभी लोग 2022 से पहले ही मृत पाए गए। उनके परिवार और स्थानीय सभासद से पुष्टि के बाद नाम हटाए गए थे।

• कासगंज में 8 नाम काटने की शिकायत आई थी। जांच में पता चला कि 7 नाम मतदाता सूची में दो बार दर्ज थे, इसलिए एक नाम हटाया गया। एक मतदाता की मौत होने पर उसकी पत्नी ने फार्म-7 भरकर नाम हटवाया था।

• बाराबंकी में 2 नाम काटने की शिकायत आई थी। जांच में पाया गया कि दोनों नाम अभी भी मतदाता सूची में दर्ज हैं। बाराबंकी डीएम ने यह भी स्वीकार किया कि सपा से हलफनामे उन्हें मिले थे और उनकी जांच की गई। इस तरह मुख्य निर्वाचन आयुक्त के ‘हलफनामा नहीं मिला’ वाले बयान पर सवाल उठ गया।

 

अब इतना सामने आते ही अखिलेश भी तिलमिला उठे है और अखिलेश यादव ने X पर लिखा- डीएम लोगों से जनता का एक मासूम सवाल है, क्यों इतने सालों बाद जवाब आया है? जिस तरह कासगंज, बाराबंकी, जौनपुर के DM हमारे 18000 शपथ पत्रों के बारे में अचानक अति सक्रिय हो गए। उसने एक बात तो साबित कर दी है कि जो चुनाव आयोग कह रहा था कि ‘एफिडेविट की बात गलत है। मतलब एफिडेविट नहीं मिले, उनकी वो बात झूठी निकली।

अगर कोई एफिडेविट मिला ही नहीं तो ये जिलाधिकारी लोग जवाब किस बात का दे रहे। अब सतही जवाब देकर खानापूर्ति करने वाले इन जिलाधिकारियों की संलिप्तता की भी जांच होनी चाहिए। कोर्ट संज्ञान ले, चुनाव आयोग या डीएम में से कोई एक तो गलत है ही न?

जो सीसीटीवी पर पकड़े गए हों, उनके द्वारा अपने घपलों पर दी गई सफाई पर किसी को भी रत्तीभर विश्वास नहीं है। झूठ का गठजोड़ कितना भी ताकतवर दिखे, लेकिन आखिरकार झूठ हारता ही है, क्योंकि नकारात्मक लोगों का साझा-गोरखधंधा अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति करने के लिए होता है।

ऐसे भ्रष्ट लोग न तो अपने ईमान के सगे होते हैं, न परिवार, न समाज के, तो फिर भला अपने साझेदारों के कैसे होंगे। ये बेईमान लोग देश और देशवासियों से ताउम्र दगा करते हैं। अंततः पकड़े जाने पर अपमान से भरी जिंदगी जीने की सजा काटते हैं।

भाजपा सरकार, चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत, वो ‘चुनावी तीन तिगाड़ा है, जिसने सारा काम बिगाड़ा है। देश के लोकतंत्र पर डाका डाला है। अब जनता इस ’त्रिगुट’ को अदालत लगाएगी।

वही सपा प्रवक्ता अमिक जामेई ने डीएम जौनपुर की पोस्ट पर कमेंट करते हुए लिखा-जब यह शिकायत की गई थी, तब आप डीएम नहीं थे। इलेक्शन कमीशन एफिडेविट की जांच करे और तत्कालीन डीएम एफिडेविट देकर बताए कि डिलीटेड वोटर मृत है। मेरे नेता अखिलेश यादव ने दो साल पहले वोट की चोरी पकड़ी थी। वोट चोरी सामने आई तो 18,000 एफिडेविट का जवाब देने के लिए अब जगे हैं? सरकारी सप्लाई वाला गांजा तो नहीं फूंके हैं?