हरियाणा की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस के भीतर अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ गई है। विधानसभा चुनावों के बाद जहां पार्टी संगठन को मजबूत करने की उम्मीद थी, वहीं अब एक नए आदेश ने सियासी माहौल को गर्मा दिया है। यह विवाद किसी चुनावी हार या टिकट बंटवारे को लेकर नहीं, बल्कि प्रदेश प्रभारी बीके हरिप्रसाद द्वारा जारी किए गए एक नए निर्देश को लेकर है।
वहीं, इस आदेश के तहत अब हरियाणा कांग्रेस के किसी भी नेता को धरना, प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस या राजनीतिक कार्यक्रम करने से पहले लिखित अनुमति यानी NOC लेना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ ही हर कार्यक्रम की जानकारी पहले से प्रदेश कांग्रेस कार्यालय को देना, और प्रदेश व जिला नेतृत्व के साथ समन्वय बनाना भी जरूरी किया गया है।
पार्टी के भीतर लंबे समय से यह शिकायत रही है कि कई नेता संगठन से अलग जाकर अपने स्तर पर कार्यक्रम करते हैं और अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी राजनीतिक छवि मजबूत करने की कोशिश करते हैं। कई बार ऐसे बयानों से पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग संदेश भी जाता है, जिससे संगठन की एकजुटता पर सवाल उठते हैं। इसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए इस नए नियम को लागू किया गया है। इसे अनुशासन स्थापित करने और पार्टी को एक दिशा में लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि इस आदेश के बाद पार्टी के भीतर विरोध की आवाजें भी उठने लगी हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं अशोक अरोड़ा और बीबी बत्रा ने इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि हर विधानसभा क्षेत्र की समस्याएं अलग होती हैं और ऐसे में हर छोटे कार्यक्रम के लिए अनुमति लेना व्यावहारिक नहीं है। इससे विधायकों की जनता के बीच सक्रियता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इस मामले पर संतुलित रुख अपनाते हुए कहा है कि विधायक अपने क्षेत्र की समस्याएं उठाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन राज्य स्तर के बड़े प्रदर्शनों के लिए संगठन की अनुमति जरूरी होनी चाहिए।
वहीं हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष राव नरेंद्र ने इस आदेश का समर्थन करते हुए कहा है कि यह कदम संगठन को मजबूत करने के लिए लिया गया है और अधिकतर कार्यकर्ता इसका स्वागत कर रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर कोई इसका विरोध कर रहा है तो वह पार्टी हित में नहीं सोच रहा है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि विरोध करने वाले दोनों नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के करीबी माने जाते हैं, जबकि यह आदेश केंद्रीय नेतृत्व की ओर से आया माना जा रहा है।
इस स्थिति ने एक बार फिर हरियाणा कांग्रेस के भीतर “केंद्रीय नेतृत्व बनाम क्षेत्रीय गुटों” की पुरानी बहस को हवा दे दी है। फिलहाल मामला खुली बगावत तक नहीं पहुंचा है, लेकिन पार्टी के अंदर असंतोष और असहमति साफ दिखाई दे रही है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस नेतृत्व संगठन में अनुशासन और नेताओं की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाता है, क्योंकि हरियाणा कांग्रेस के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं दिख रहा है।
