Savitribai Phule:देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की जयंती पर उन्हें नमन
सचमुच सावित्रीबाई फुले(Savitribai Phule) वह क्रांति-ज्योति थीं, जिनके उजाले ने उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों को अशिक्षा, अंधविश्वास और सामाजिक बेड़ियों के अंधेरे से बाहर निकलने की राह दिखाई। वे केवल शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि स्त्रियों के अधिकार, सम्मान और गरिमा के लिए चल रहे संघर्ष की अग्रदूत थीं। बाल विवाह, दहेज प्रथा और पर्दा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने निर्भीक होकर मोर्चा लिया। विधवा विवाह को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष किया और उपेक्षित, तिरस्कृत स्त्रियों को नया जीवन देने का प्रयास किया। पति की चिता को मुखाग्नि देकर उन्होंने यह संदेश दिया कि स्त्री किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है।

सावित्रीबाई फुले(Savitribai Phule) के योगदान को समझने के लिए आज के समय से तुलना करने के बजाय उन्नीसवीं सदी के उस दौर को याद करना आवश्यक है, जब स्त्री का पढ़ना-लिखना तो दूर, घर से बाहर निकलना भी अपराध माना जाता था। समाज की आधी आबादी अपने अधिकारों से पूरी तरह वंचित थी। हर कदम पर बंदिशें थीं और परंपराओं का कठोर पहरा था। ऐसे समय में वंचित समाज से निकलकर सावित्रीबाई फुले ने इतिहास रचा।
3 जनवरी 1831 को एक साधारण माली परिवार में जन्मी सावित्रीबाई(Savitribai Phule) का विवाह बहुत कम उम्र में ज्योतिबा राव फुले से कर दिया गया। उस समय अधिकांश परिवारों में लड़कियों की शिक्षा की कल्पना तक नहीं की जाती थी, विशेषकर उस समाज में, जहाँ से सावित्रीबाई (Savitribai Phule)आती थीं। लेकिन उनका सौभाग्य था कि उनके जीवनसाथी ज्योतिबा फुले स्वयं समाज सुधार के लिए समर्पित थे। वे अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना चाहते थे और स्त्रियों की शिक्षा तथा समानता के प्रबल समर्थक थे।

ज्योतिबा ने समाज बदलने की शुरुआत अपने घर से की। वे अपनी पत्नी को शिक्षित करना चाहते थे और सावित्रीबाई में सीखने की तीव्र जिज्ञासा और लगन थी। उस समय पति द्वारा पत्नी को पढ़ाने का निर्णय सामाजिक विद्रोह जैसा माना जाता था। परिवार और समाज की आलोचनाओं के बावजूद ज्योतिबा ने सावित्रीबाई को पढ़ाया और आगे शिक्षिका बनने के लिए प्रोत्साहित किया।
सावित्रीबाई ने पुणे के मिशनरी स्कूल में शिक्षण का प्रशिक्षण प्राप्त किया। यह कदम अपने आप में साहसिक था। जैसे ही वे घर से बाहर निकलकर पढ़ाने जाने लगीं, विरोध और अपमान का सिलसिला शुरू हो गया। रास्ते में उन पर गोबर, कीचड़ और पत्थर फेंके गए। उनके चरित्र पर सवाल उठाए गए, ताकि उन्हें डराकर घर में कैद किया जा सके। लेकिन सावित्रीबाई का संकल्प अडिग था। वे अतिरिक्त साड़ी साथ लेकर चलती थीं और रास्ते में अपवित्र की गई साड़ी बदलकर स्कूल पहुंचती थीं।
1848 में सावित्रीबाई(Savitribai Phule) और ज्योतिबा फुले ने पुणे के भिड़े वाड़ा में पहला बालिका विद्यालय स्थापित किया। यह केवल एक स्कूल नहीं था, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध खुला विद्रोह था, जो स्त्रियों की शिक्षा को पाप मानती थी। इस विद्यालय में जाति, वर्ग और धर्म के भेद के बिना सभी लड़कियों को प्रवेश दिया गया। सावित्रीबाई स्वयं इसकी प्रधान शिक्षिका बनीं। समाज के विरोध के बीच कई प्रबुद्ध समाज सुधारकों ने इस प्रयास में सहयोग दिया। जल्द ही फुले दंपति ने दलितों और पिछड़ी जातियों के बच्चों के लिए भी कई विद्यालयों की स्थापना की।
सावित्रीबाई(Savitribai Phule) का संघर्ष केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। वे बाल विवाह के दुष्परिणामों, विधवाओं की दुर्दशा और सामाजिक तिरस्कार के विरुद्ध लगातार सक्रिय रहीं। उन्होंने विधवाओं और अविवाहित गर्भवती महिलाओं के लिए बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, जहाँ उन्हें सुरक्षित आश्रय और सम्मान मिल सके। विधवा विवाह को प्रोत्साहित कर उन्होंने समाज की कथित नैतिकता को चुनौती दी।

वे सत्यशोधक समाज की भी सक्रिय नेता रहीं, जिसकी स्थापना ज्योतिबा फुले ने 1873 में ब्राह्मणवादी वर्चस्व, अंधविश्वास और जातिगत शोषण के विरोध में की थी। सावित्रीबाई ने महिलाओं को इस आंदोलन से जोड़ा और उन्हें आत्मसम्मान तथा सवाल करने का साहस दिया।
1890 में ज्योतिबा फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई ने परंपराओं को तोड़ते हुए स्वयं उन्हें मुखाग्नि दी। 1897 में पुणे में फैले प्लेग के दौरान जब लोग संक्रमितों को छोड़कर भाग रहे थे, तब सावित्रीबाई (Savitribai Phule)बीमारों को कंधे पर उठाकर अस्पताल पहुंचा रही थीं। इसी सेवा के दौरान वे स्वयं प्लेग से संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।
देश की पहली महिला टीचर सावित्री बाई फुले की जयंती आज

