Reel politics begins in Bihar elections: बिहार चुनाव में शुरू हुई ‘रील’ राजनीतिReel politics begins in Bihar elections: बिहार चुनाव में शुरू हुई ‘रील’ राजनीति

Reel politics begins in Bihar elections: बिहार चुनाव में शुरू हुई ‘रील’ राजनीति

बिहार चुनावी माहौल में नेताओं की बयानबाजी अपने चरम पर है. एक ओर सत्ताधारी एनडीए विकास और डिजिटल उपलब्धियों का बखान कर रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष इन दावों पर सवाल खड़े कर रहा है. इस बार बहस का नया मुद्दा बना है—‘रील ट्रेंड’ और सस्ता इंटरनेट डेटा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को बिहार में चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए अपने पहले ही भाषण में डिजिटल इंडिया अभियान की उपलब्धियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि आज भारत में इंटरनेट डेटा दुनिया में सबसे सस्ता है, और यह उनकी सरकार की बड़ी उपलब्धि है. पीएम मोदी ने कहा, “आज 1 जीबी डेटा की कीमत एक कप चाय से भी कम है. बिहार के लाखों युवा इसका फायदा उठा रहे हैं. वे इंटरनेट की मदद से अपनी कला और क्रिएटिविटी पूरी दुनिया को दिखा रहे हैं. कई युवा सोशल मीडिया पर रील बनाकर अच्छी कमाई भी कर रहे हैं.”

प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर ‘डिजिटल इंडिया’ के उस विजन से जुड़ा है, जिसमें सस्ते डेटा और इंटरनेट पहुंच को देश की प्रगति का प्रतीक बताया गया था. दरअसल, 4G तकनीक और कम डेटा कीमतों ने भारत को डिजिटल क्रांति की दिशा में आगे बढ़ाया है. मोबाइल इंटरनेट ने ग्रामीण इलाकों तक कनेक्टिविटी पहुंचाई और युवाओं को रोजगार के नए अवसर दिए. अब एनडीए सरकार इसे अपनी चुनावी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है.

लेकिन विपक्ष ने इस बयान पर तीखा पलटवार किया है. बिहार कांग्रेस ने अपने एक्स (पूर्व ट्विटर) हैंडल पर राहुल गांधी का एक पुराना वीडियो शेयर करते हुए लिखा—“अंतर साफ है.” इस वीडियो में राहुल गांधी युवाओं की आदतों पर चिंता जताते नजर आ रहे हैं. उन्होंने कहा था, “आज के युवा रोजाना 7-8 घंटे रील देखते रहते हैं और दोस्तों को भेजते रहते हैं. अंबानी और अडानी के बेटे वीडियो नहीं देखते, वे पैसे गिनने में व्यस्त रहते हैं.”

राहुल गांधी का यह बयान युवाओं की प्राथमिकताओं और डिजिटल व्यसन पर सवाल उठाता है. कांग्रेस ने इस वीडियो के जरिए यह दिखाने की कोशिश की है कि सस्ता डेटा जितना अवसरों का जरिया बना है, उतना ही यह युवाओं को ‘स्क्रीन की लत’ में भी फंसा रहा है.

इसी बहस में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर भी कूद पड़े. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम बिहार में सस्ता डेटा दे रहे हैं. मैं उनसे कहना चाहता हूं—‘हमें डेटा नहीं, बेटा चाहिए’. आप कारखाने गुजरात ले जाते हैं और डेटा बिहार को देते हैं ताकि यहां के लोग अपने बच्चों को वीडियो कॉल पर ही देख सकें.”

किशोर के इस बयान ने राजनीतिक विमर्श को एक नया मोड़ दिया. उन्होंने रोजगार और पलायन के मुद्दे को जोड़कर यह संकेत दिया कि सस्ता डेटा भले ही तकनीकी विकास का प्रतीक हो, लेकिन इसका सीधा फायदा तब तक सीमित रहेगा जब तक स्थानीय रोजगार के अवसर नहीं बनते.

पीएम मोदी के भाषण का फोकस जहां कंटेंट क्रिएटर्स और डिजिटल उद्यमिता को बढ़ावा देना था, वहीं राहुल गांधी का फोकस था रील देखने वालों की आदतों पर. आंकड़ों के मुताबिक, रील देखने वालों की संख्या रील बनाने वालों की तुलना में कई गुना ज्यादा है. सोशल मीडिया पर ‘डूम स्क्रोलिंग’ यानी लगातार वीडियो देखते रहना, अब मानसिक स्वास्थ्य की समस्या बन चुकी है.

विशेषज्ञों का कहना है कि रील्स और शॉर्ट वीडियो ने युवाओं के मनोरंजन और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इसके अंधाधुंध उपयोग ने उन्हें आभासी दुनिया में कैद भी कर दिया है. कई युवा अब कंटेंट क्रिएटर बनने की चाह में पारंपरिक करियर विकल्पों से दूर जा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर, कुछ युवाओं ने इसी प्लेटफॉर्म को आजीविका का जरिया बना लिया है.

एनडीए जहां डिजिटल भारत की कहानी को अपनी चुनावी ताकत बना रहा है, वहीं विपक्ष यह बताने की कोशिश कर रहा है कि सिर्फ इंटरनेट नहीं, रोजगार और उत्पादकता भी उतनी ही जरूरी है. सियासी मंचों पर अब ‘रील बनाम रियल’ की यह जंग बिहार की जनता के बीच नई बहस छेड़ चुकी है—क्या सस्ता डेटा ही असली विकास है या फिर यह सिर्फ एक और चुनावी जुमला?