पंजाब: आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका
पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी के लिए संगरूर से एक बड़ी राजनीतिक चुनौती उभरकर सामने आई है। राज्य में सरकार होने के बावजूद, आम आदमी पार्टी की पकड़ अपने ही गढ़ संगरूर में ढीली पड़ती दिख रही है।
नगर कौंसिल में पार्टी को पहले ही बहुमत नहीं मिला था, और अब आठ पार्षदों के अचानक इस्तीफे से आम आदमी पार्टी अल्पमत में आ गई है। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को ‘मिनी तख्तापलट’ की शुरुआत बताया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के सीनियर उपप्रधान, उपप्रधान और कुल 8 पार्षदों ने न सिर्फ पार्टी से इस्तीफा दिया है, बल्कि खुलकर अपने असंतोष के कारण भी बताए हैं। उनका कहना है कि, पिछले कई महीनों से शहर के विकास कार्य ठप पड़े हैं और पार्टी हाईकमान की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल रहा।
इतना ही नहीं, स्थानीय नेतृत्व पर भी आरोप लगे हैं कि, वे जमीनी स्तर की समस्याओं को लेकर बिल्कुल गंभीर नहीं है।

संगरूर नगर कौंसिल चुनावों में आम आदमी पार्टी बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर सकी थी। हालांकि बाद में कुछ आजाद पार्षदों के समर्थन से पार्टी ने नगर कौंसिल पर कब्जा जमाया और अपना प्रधान चुना। लेकिन, ये स्थिरता अधिक दिनों तक नहीं टिक सकी। महज पांच महीने बाद ही 8 पार्षदों के पार्टी से किनारा करने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।
ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि, इन इस्तीफों के बाद अब कौंसिल में विपक्षी दलों और आजाद पार्षदों की भूमिका बेहद अहम हो गई है। फिलहाल नगर कौंसिल में कुल 33 पार्षद हैं, जिनमें से प्रधान को हटाने के लिए 21 पार्षदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में सत्ता समीकरण किसी भी वक्त बदल सकते हैं।
गौरतलब ये है कि, पार्षदों के इस्तीफे की घोषणा हुए 24 घंटे बीत जाने के बावजूद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई बयान सामने नहीं आया है। स्थानीय कार्यकर्ताओं में भी ये सवाल उठ रहा है कि, आखिर पंजाब में सत्ता में होने के बावजूद पार्टी अपने ही गढ़ में संकट से जूझ रही है।
सूत्रों का कहना है कि, संगरूर, जो कभी भगवंत मान का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता था, वहां इस तरह की अस्थिरता आम आदमी पार्टी के लिए आने वाले समय में बड़ा नुकसान साबित हो सकती है। पार्षदों ने इस्तीफे के पीछे प्रमुख कारण नगर के विकास कार्यों में आई रुकावट को बताया है।
उनका कहना है कि, न तो शहर में सफाई व्यवस्था सुधरी, न ही सड़कों और जल निकासी की स्थिति में कोई सुधार हुआ। कई बार प्रधान और विधायक से बात करने के बावजू

द कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इससे पार्षदों में नाराज़गी बढ़ती गई और अंततः उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया।
एक पार्षद ने कहा कि, “हम जनता से विकास के वादे करके आए थे, लेकिन अब जनता के सामने जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। ऊपर से पार्टी नेताओं की उदासीनता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं।”
8 पार्षदों के इस्तीफे के बाद आजाद पार्षदों ने भी आप से दूरी बनानी शुरू कर दी है।
उनका कहना है कि, पार्टी की ओर से अब किसी तरह का समन्वय नहीं रह गया है और फैसले केवल कुछ लोगों तक सीमित हो गए हैं। ऐसे में उनका समर्थन बनाए रखना मुश्किल है।
इस राजनीतिक हलचल के बाद विपक्षी दलों के चेहरे खिल गए हैं। कांग्रेस और शिअद दोनों ही इस मौके का फायदा उठाने की तैयारी में हैं। सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दलों ने बागी पार्षदों से संपर्क साधना शुरू कर दिया है ताकि नगर कौंसिल में सत्ता पलट की संभावना बनाई जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये घटनाक्रम न सिर्फ नगर कौंसिल तक सीमित रहेगा, बल्कि इसका असर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक पड़ सकता है। संगरूर भगवंत मान का गृह जिला है, ऐसे में यहां पार्टी की कमजोरी को राजनीतिक विरोधी बड़े मुद्दे के तौर पर पेश करेंगे।

